Monday, July 8, 2013

In the beginning one must have faith, then he will be interested to seek the association of a Guru. Afterwards he will practice devotion under his guidance. Proper faith and a proper Guru can lead to the attainment of the goal.
.......JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
भगवान आनंद -स्वरुप हैं अतः उनका अंश जीव भी आनंद ही चाहता है !

God is the embodiment of bliss.Therefore being his part ,the individual soul naturally desires only bliss.
......JAGADGURU SHREE KRIPALU JI MAHARAJ.
जीव जिस अनंत दिव्यान्नद को चाहता है ,वह केवल श्रीकष्ण कृपा से ही प्राप्त होगा !

The unlimited divine bliss desired by the individual soul can be attained only by the grace of shri krishna.
........JAGADGURU SHREE KRIPALU JI MAHARAJ.
स्वार्थ माने आनंद की भूख। हम आनंद रूपी भगवान् के अंश हैं , इसलिये नैचुरल आनंद चाहते हैं। ये कोई बुराई नहीं है।
स्वारथ साँचु जीव का एहा। मन क्रम वचन राम पग नेहा।
तो स्वार्थी बनना है , लेकिन सच्चा स्वार्थ। शरीर का स्वार्थ नहीं , शरीर को चलाने के लिये भगवान् ने संसार बनाया है। खाना खाओ , कपड़ा पहनो, विटामिन , प्रोटीन , सब ढंग से लो तो भजन कर सकोगे। साधना कर सकोगे। तो रो कर भगवान् से उनका दिव्य प्रेम , दिव्य दर्शन मांगो। संसार नहीं मांगना भगवान् से कभी चाहे प्राण जा रहे हों।
........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
संत, कृपा कह कर नहीं कर के दिखाते हैं।
...श्री महाराज जी।
भगवान् की शरण जाना तब ही सम्भव है जब जीव यह प्रतिज्ञा कर ले कि वह कभी हरि - गुरु के प्रति प्रतिकूल चिंतन नहीं करेगा ।
--------श्री महाराज जी।
"जीवन वही है जो हरि-गुरु सेवा में ही लगा रहे।
-----श्री महाराजजी।"

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...