Friday, July 12, 2013

ऐसे है हमारे महाराजजी...........

कैसी तेज गति है उनकी एक क्षण भी अपना व्यर्थ नहीं जाने देते हैं। सर्दी गर्मी बरसात आँधी तूफान कैसा भी मौसम हो वे सदैव गतिशील ही रहते हैं। उनकी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं होता कैसे भी परिस्थिति हो कैसा भी उनका स्वास्थ्य हो, अपने सुख को तो भूल ही गये हैं ,सदैव अपने शरणागत जीवों का सुख का ही चिंतन करते रहते हैं।
The world can be fooled by external behaviour; but God is controlled only by true love.
........SHRI MAHARAJJI.
The absolute essence of all the Divine philosophies is to attach yourself in loving remembrance of your soul beloved krishna with a growing desire to serve Him more and more.
...........SHRI MAHARAJJI.
अहंकार से बचना और अपमान को सहर्ष ग्रहण करना, यह साधना की आधारशिला है ।
----------श्री महाराजजी।
"भगवान और महापुरुष की कोई बात समझ में आ जाती है, यह आश्चर्य है। नहीं आती,यह स्वाभाविक है,क्योकि हम मायिक हैं, और महापुरुष अमायिक। यदि तुम किसी महापुरुष को तभी मानो जब उसकी बातें तुम्हें समझ में आ जाये, तो शास्त्र कहते हैं, इस पैमाने से तुम जहाँ हो ,उससे और पीछे खिसकते जाओगे,क्योकि ईश्वरीय जगत के बड़े ही सूक्ष्म और रहस्य के कानून हैं। उन्हे केवल उनकी "गवर्नमेंट" वाले ही जानते हैं।
-----जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज।"
Every destination has two ways: one is the right way and the other is the wrong way. If one knows the right way, then no matter how far away the goal is, the destination will one day be reached. On the other hand, if the wrong path is chosen, then no matter how far or near the goal is, disappointment is certain.
.......JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
सब साधन संपन्न कहँ , पूछत सब संसार |
साधनहीन प्रपन्न कहँ , पूछत नंदकुमार ||३९||

भावार्थ – संसारी लोग उसी से प्यार करते हैं , जिसके पास संसारी वैभव होता है | किन्तु श्यामसुंदर अकिंचन से प्यार करते हैं |

(भक्ति शतक )
जगदगुरु श्री कृपालुजी महाराज द्वारा रचित |

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...