This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Friday, July 26, 2013
ब्रह्म
सर्वव्यापक, है सर्वनियन्ता है, सर्वसृष्टा है। जबकि जीव व्याप्य है,
नियम्य है, सृज्य है। जीव के ब्रह्म से अनेक संबंध हैं। वस्तुतः श्रीकृष्ण
ही जीव के माता, पिता, भ्राता, स्वामी, सखा, पुत्र, प्रियतम, सब कुछ हैं।
इन्हीं संबंधों से केवल श्रीकृष्ण की निष्काम सेवा करनी है।
........जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।
........जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।
Friday, July 12, 2013
आँसू
बहाने से अन्तःकरण शुद्ध होगा, याद कर लो सब लोग, रट लो ये कृपालु का
वाक्य। भोले बालक बनकर रोकर पुकारो, राम दौड़े आयेंगे। सब ज्ञान फेंक दो,
कूड़ा-कबाड़ा जो इकट्ठा किया है। अपने को अकिंचन, निर्बल, असहाय, दींन हीन,
पापात्मा महसूस करो, भीतर से, तब आँसू की धार चलेगी, तब अन्तःकरण शुद्ध
होगा, तब गुरु कृपा करेगा। गुरु की कृपा से राम के दर्शन होंगे, राम का
प्यार मिलेगा और सदा के लिये आनन्दमय हो जाओगे।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
ऐसे है हमारे महाराजजी...........
कैसी तेज गति है उनकी एक क्षण भी अपना व्यर्थ नहीं जाने देते हैं। सर्दी
गर्मी बरसात आँधी तूफान कैसा भी मौसम हो वे सदैव गतिशील ही रहते हैं। उनकी
दिनचर्या में कोई अंतर नहीं होता कैसे भी परिस्थिति हो कैसा भी उनका
स्वास्थ्य हो, अपने सुख को तो भूल ही गये हैं ,सदैव अपने शरणागत जीवों का
सुख का ही चिंतन करते रहते हैं।
कैसी तेज गति है उनकी एक क्षण भी अपना व्यर्थ नहीं जाने देते हैं। सर्दी गर्मी बरसात आँधी तूफान कैसा भी मौसम हो वे सदैव गतिशील ही रहते हैं। उनकी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं होता कैसे भी परिस्थिति हो कैसा भी उनका स्वास्थ्य हो, अपने सुख को तो भूल ही गये हैं ,सदैव अपने शरणागत जीवों का सुख का ही चिंतन करते रहते हैं।
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
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