Friday, August 2, 2013

केवल भगवान् की भक्तिकरो । और साथ में 'गुरुदेवतात्मा' गुरु को अपना इष्टदेव मानो,भगवान् के बराबर मानो , अपनी आत्मा मानो । शरणागत हो जाओ । जैसी भक्ति भगवान् में हो वैसी गुरु में हो । और कहीं न हो मन का अटैचमेन्ट ( attachment ) बस ये दावा है , इससे सन्मुख हो जाओ और सन्मुख हो जाओगे तो बस बिगड़ी बन जायेगी । तब तुम्हारा ये कहना सही होगा कि - किशोरी मोरी , बिगरी देहु बनाय ।
********जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी*********
गुरु का एक ही अर्थ है, जो तुम्हारी नींद तोड़ दे। और नींद का टूटना हमेशा दु:खद है। जो भी तुम्हारी नींद तोड़ेगा, उसपर तुम नाराज़ होओगे, क्योंकि वह तुम्हें बेचैनी में डाल रहा है। इसलिए गुरु शुरु में तो कष्टदायी मालूम पड़ता है, दु:खदायी मालूम पड़ता है, परंतु बाद में परम सुखदायी है। — with Ghytri Harripersad.
The Rig Ved says this. "Oh, human beings, learn to cry! Shed tears and call out to Him - that's it! He will be standing before you."
-------- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj.
साधकों को सावधान करते हुये कहा गया है ; भगवान् एवं भगवज्जन के कार्य लीला मात्र हैं। लीला रसास्वादन हेतु होता है। बुद्धि का प्रयोग लीला में वर्जित है। भगवान् के सभी नाम , रूप , लीला , गुण , धाम व जन दिव्य हैं। यानी सांसारिक बुद्धि का प्रयोग करने से जीव भ्रम में पड़ जायगा। ' संशयात्मा विनश्यति ' रामावतार में सीता को खोजते हुये , अज्ञता का अभिनय करते हुये श्रीराम को देखकर सती को भ्रम हो गया। वे उन्हें साधारण राजकुमार समझ कर परीक्षा ले बैठीं। परिणाम स्वरूप भगवान् शिव ने उसका परित्याग कर दिया। पुनः पार्वती के रूप में भगवान् शिव के मुख से श्रद्धा पूर्वक रामचरित्र सुना। सती द्वारा संशय किये जाने से संसार को रामचरित्र प्राप्त हुआ। सती ने स्वयं शंका कर संसार को यह दिखाया कि भगवत्लीला में संशय नहीं करना चाहिये।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
SHREE MAHARAJJI REMINDS US:

Practise devotion in all places; don't even think that a place is dirty or impure and therefore unfit for prayer to god.God purifies everything that is impure,and he himself can never become impure in the process.God has simplified the practice of devotion to such an extent,that everyone can practise it in any circumstance.
EVERY DEVOTIONAL PRACTICE IS RELATED ONLY TO MIND.ANY SPIRITUAL DISCIPLINE PRACTISED MERELY WITH SENSES IS NOT SPIRITUAL DISCIPLINE AT ALL.
------JAGADGURUTTAM SHRI KRIPALU JI MAHAPRABHU.
चुम्बक का कमाल,शुद्ध लोहे पर होता है, मिलावट वाले पर नहीं हो सकता। जिस लोहे में 90 परसेंट मिलावट है, उसको चुंबक नहीं खींच सकता। वो तो केवल क्लीन(clean) लोहा हो उसी को खींचता है। तो भगवान का अवतार या संत महापुरुष उसी को जल्दी खींच सकते हैं ,जिसका अंत:करण जितना शुद्ध हो। पापात्मा नहीं खिंचता वो हँसता है। बाबाजी क्या बोल रहे थे? भगवान,इन लोगो को और कोई काम नहीं है।मज़ाक बनाते हैं,खिल्ली उड़ाते हैं।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...