Sunday, August 11, 2013

Shri Maharaj ji's Golden words:

Not even 6 people out of 6 billion people in this world know what paap (sin) is. The time we spend in remembering Lord KRISHNA and the time we spend in association with Mahapurush (Guru) is the only time we do not commit paap (sin). All the remaining time we commit paap (sin) only.
हम दिन भर क्या कर रहे हैं? '420' ही तो कर रहे हैं की भगवान हमारा है। और सच क्या है कि उनको छोड़ करके संसार को अपना मान करके संसार ही में सुख ढूँढ रहे हैं।
........श्री महाराजजी।
The true meaning of the word LOVE (prem) is to give, give, give. Still not be proud or complacent about it. The feeling that I have not given enough yet". The highest ideal of such love was established by Maidens (Gopika) in Holy land of Braj in India for Shri Krishn.
आज नहीं कल कर लेंगे। बस ये कर लें,बस वो कर लें,फिर भजन करेंगे। इस प्रकार अनंत जन्म गँवा दिये लेकिन वह आज और कल न आ सका।
.......श्री महाराजजी।

Friday, August 2, 2013

It is important that we learn to become neutral. We should never have any ill feelings towards anyone, even towards those who hate us and criticize us.
महापुरुषों के स्मरणमात्र से ही अंतःकरण शुद्ध हो जाता है। फिर वह स्वयं साक्षात् आपके घर पर पधार जायें तब तो वो घर मंदिर बन जाता है , पवित्र हो जाता है। उनके दर्शन , स्पर्श , चरणप्रक्षालन और आसन दान आदि का सौभाग्य मिलने पर तो वो जीव धन्य हो जाता है , कृतकृत्य हो जाता है।
...........श्री महाराज जी।
ब्रह्म  सर्वव्यापक, है सर्वनियन्ता है, सर्वसृष्टा है। जबकि जीव व्याप्य है, नियम्य है, सृज्य है। जीव के ब्रह्म से अनेक संबंध हैं। वस्तुतः श्रीकृष्ण ही जीव के माता, पिता, भ्राता, स्वामी, सखा, पुत्र, प्रियतम, सब कुछ हैं। इन्हीं संबंधों से केवल श्रीकृष्ण की निष्काम सेवा करनी है।
........जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...