Monday, August 19, 2013

श्यामसुंदर तुमसे मिलने को व्याकुल हैं......किन्तु तुम यह नहीं जानते थे।

अब यदि जान भी गए हो तो...............................मानना नहीं चाहते।

तुमने संसार में अकारण करुणा का व्यवहार कहीं नहीं देखा है........शायद इसीलिए अप्रतीती होती है।

यदि तुम यह मान लो की.........वे आज और अभी ही तुमसे मिलने को व्याकुल हैं, तो बस तुम्हारे ह्रदय में भी उनके जैसी ही व्याकुलता उत्पन्न हो जाये और बस ...वे मिल जायेंगे।

वो तुम्हारे झूठ मूठे रूप ध्यान , नाम , गुण आदि को भी तन्मयता से सुनते और देखते हैं...की शायद अब की बार ठीक से करेगा।

पर होता क्या है...? वो परखते ही रह जाते हैं.......और तुम उनके अहैतुकी स्नेह को न समझने के कारण ठीक ठीक नहीं कर पाते।

इसलिए तुम उपरोक्त बात को मान लो ...जिस समय तुम मेरी बात पर विश्वास कर लोगे...बस यही स्वर्ण मुहूर्त होगा तुम्हारा।

----- तुम्हारा कृपालु।
अगर आपको पुरा विश्वास है कि भगवान सब के ह्रदय में बैठा है और सर्वान्तर्यामी है और उसको पता है आपको क्या चाहिये तो आप उनसे कुछ मांगोगे ही नहीं.

If you truely believe that God is with in heart of every soul and is all knowing, and he knows what you need ,then you would not ask him for anything.
.........JAGADGURU SHRI KRIAPLU JI MAHARAJ.
"Service (seva) (physical or monetary) (tan se ya dhan se) is a token of your love and dedication at your master's feet which he accepts out of his kindness.If a rasik saint accepts your services,it is only his grace upon you.
------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ."
"Mind In 'God' And 'Body' In The World Is 'Karmyog' ; Whereas Bodily Worshipping God And Having Attachments In The World Is 'Absolute Ignorance'.
------JAGADGURU KRIPALUJI MAHARAJ."
' गु ' शब्द का अर्थ माया का अन्धकार , ' रु ' शब्द का अर्थ नाश करना है। अर्थात जो माया रूपी अन्धकार का नाश कर दे वही गुरु है।
.......श्री महाराज जी।
Receiving a mantra from the Guru, massaging his feet, offering him worldly objects or lavishing false praises on him does not constitute true surrender.

केवल कान फूंका लेने मात्र से अथवा गुरूजी के पैर दबाने मात्र से , अथवा गुरु जी को सांसारिक द्रव्य देने मात्र से ,अथवा बातें बनाने मात्र से ,शरणागति नहीं हो सकती !!
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.

'इस जन्म में न हो, अगले जन्म में भगवान् को पाउँगा यह कैसी बात है? ऐसा ढीलाढाला सुस्त भाव नही रखना चाहिए! उनकी कृपा से उन्हें इसी जन्म में प्राप्त करूंगा - मन में इस तरह का जोर रखना चाहिए, विश्वास रखना चाहिए! इसके बिना नही होगा! ढीला ढाला भाव अच्छा नही! अपने में जोर लाकर, विश्वास के साथ कहो - ' उन्हें जरुर पाऊंगा, अभी इसी क्षण पाऊंगा!
..........श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...