Monday, August 19, 2013

साधक को अपनी शरणागति पर ध्यान देना चाहिए। वैसे आप लोगों को लगता है कि हम पूर्ण शरणागत हैं लेकिन वस्तुतः ऐसा है नहीं। छोटी सी भी बात आप से कही जाती है, आपका तुरंत उत्तर होता है नहीं हमने तो ऐसा नहीं किया अथवा ऐसा किया तो नहीं था न जाने कैसे हो गया? बाहर से आप मान भी लें लेकिन भीतर से अपनी गलती स्वीकार नहीं करते। गुरु आपके अन्दर की बात नोट करते हैं। वह परीक्षा भी लेता है। और साधक परीक्षा में फेल हो गया तब भी गुरु बारम्बार परीक्षा लेना बंद नहीं करता। जिस कक्षा का जीव है उसी कक्षा का परचा उसको दिया जाता है। अगर आप परीक्षा देने से घबराएंगे तो आप कभी भी भगवद प्राप्ति नहीं कर सकेंगे। इस प्रकार बार बार परीक्षा देते हुए हमें शरणागति को पूर्ण करना है।
............जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।
आदेश पालन हो सदा गुरुधाम !
आदेश पालन ते मिलें श्याम श्यामा !!

भावार्थ --साधक को बड़ी सावधानी से सद्गुरु के आदेश का सदा पालन करना चाहिए !
गुरु आदेश -पालन से ही श्यामा श्याम की प्राप्ति होगी
.......जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।
जब तक मन शुद्ध नहीं होता तब तक वेद - वाणी एवं गुरु वचनों पर विशवास नहीं होता।
.........श्री कृपालु जी महाराज।
गुरु जो कहे,आज्ञा मानने का अर्थ है कि उसमे तुम बुद्धि मत लगाना।क्योंकि अगर तुमने बुद्धि लगाई ,सोचा फिर माना,तो तुम अपनी आज्ञा मान रहे हो,गुरु की आज्ञा नहीं।
..........श्री महाराजजी।
Remembering God's form while practicing devotion is compulsory.
............SHRI MAHARAJ JI.
सहनशील बनो तथा कभी भी किसी की बात को फील न करो। सदा अपने अंदर झाँको। दूसरा चाहे कुछ भी करे, तुम्हें तो बस अपने से ही मतलब रखना चाहिए। यदि कोई कमाएगा तो भी अपने लिए ,गँवाएगा तो भी अपने लिए ।
------श्री महाराजजी।
जीव ने न जाने कितनी बार संत व् भगवान् का दर्शन , संग आदि किया पर उन पर विशवास नहीं किया अतः पाप ही करता रहा।
-------श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...