This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, August 19, 2013
सर्वप्रथम
यह विचार कीजिये कि संसार के किसी भी पदार्थ में आनन्द नहीं है। आप कहेंगे
कि हम लोगों को जब धन, पुत्र, स्त्री, पति आदि में आनन्द मिलता है तब
हमारी बुद्धि यह कैसे मान ले कि संसार में आनन्द नहीं है ? किन्तु
गम्भीरता-पूर्वक विचार करने पर बुद्धि अपना निश्चय बदल देगी। अच्छा यह
बताइये कि वह कौन सी वस्तु है जिसमें आनन्द है? यदि किसी एक वस्तु में
आनन्द होता तो एक तो वह आनन्द सबको मिलता, दूसरे उस आनन्द का वियोग न होता
अर्थात् उस पर दुःख का अधिकार न हो पाता। किन्तु ये दोनों ही बातें किसी
पदार्थ से सिद्ध नहीं होतीं। यथा, मदिरा को ही ले लीजिये। मदिरा के नाम से
एक घोर पियक्कड़ शराबी को आनन्द मिलता है, पुनः पीने से तो मिलता ही होगा
किन्तु उसी मदिरा से एक धर्मात्मा पंडित को महान अशान्ति होती है। यदि खाने
के साथ शराबी के आगे शराब रख दी जाय तो वह बहुत खुश होगा जबकि वह
कर्मकांडी पंडित बहुत दुःखी होगा। तो शराब में शराबी के अनुभव में आने वाला
सुख है या पंडित जी के अनुभव में आने वाला दुःख है ? यदि आप कहें कि पंडित
जी ने शराब को पिया नहीं, देखकर ही अशान्त हो रहे हैं, यदि पीते तो उन्हें
भी शराबी की भाँति आनन्द ही मिलता, तो यह कहना भ्रान्तिजनक है, क्योंकि
यदि पंडित जी को शराब पिला दी जाय तो उल्टी हो जायगी और शायद धर्म के नाते
जीवन भर दुःखी रहेंगे।
प्रेम रस सिद्धान्त,
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
संस्करण 2010, अध्याय 3: आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप, पृ. 58
प्रेम रस सिद्धान्त,
रचयिता- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
संस्करण 2010, अध्याय 3: आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप, पृ. 58
संसार
में जो सुख या दुःख हमें मिलता है, वो हमारा माना हुआ सुख या दुःख है।
वास्तविकता में संसार की किसी वस्तु या व्यक्ति में न सुख है, न दुःख। जिस
वस्तु में हम सुख मान लेते हैं, उस वस्तु के मिलने पर हमें सुख मिलता है और
यदि वो वस्तु न मिले या छिन जाये, तो हम दुःखी हो जाते हैं। अतः संसार में
सुख दुःख दोनों नहीं हैं। यदि हम कहीं सुख न मानें तो किसी से दुःख नहीं
मिलेगा।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
जिस
जीव के हृदय मे पश्चाताप है , वह परम उन्नति कर सकता है , परंतु जिसे अपने
बुरे कर्मों पर दुःख नहीं होता , जो अपनी गिरि दशा का अनुभव नहीं करता ,
जिसे समय के व्यर्थ बीत जाने का पश्चताप नहीं , वह चाहे कितना भी बड़ा
विद्वान हो , कैसा भी ज्ञानी हो , कितना भी विवेकी हो , वह उन्नति के शिखर
पर कभी नहीं पाहुच सकता । जहां पूर्वकृत कर्मों पर सच्चे हृदय से पश्चाताप
हुआ , जहां सर्वस्व त्याग कर श्री कृष्ण के चरणों मे जाने की इच्छा हुई ,
वहीं समझ लो उसकी उन्नति का श्री गणेश हो गया । वह शीघ्र ही अपने लक्ष्य को
प्रपट कर लेगा।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।
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