This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Monday, August 19, 2013
प्रीति की रीति न सखि सब जान |
जो मन रह रत सुत वनितनि पति, सो न सकत पहिचान |
पुनि जो मन रह रत श्रुति कर्मन, सोउ मन जान अयान |
पुनि सोउ मन नहिं जानि सकत जो, निरत मुक्ति हित ज्ञान |
जो मन लोकन वेदन मुक्तिन, ह्वै विरक्त भज कान्ह |
सोइ ‘कृपालु’ तिन अनुकंपा ते, प्रीति - रीति उर आन ||
भावार्थ - अरी सखी ! प्रीति की रीति को बिरले ही जानते हैं | जो मन
स्त्री, पुत्र, पति आदि में आसक्त रहता है वह नहीं समझ सकता, जो मन वेद -
विहित कर्म धर्म में आसक्त रहता है वह भी नहीं समझ सकता | और वह भी नहीं
समझ सकता जो अद्वैत - ज्ञान के द्वारा मुक्ति में आसक्त है | जो मन लोक -
वेद एवं मुक्ति आदि से विरक्त होकर श्यामसुन्दर में आसक्त होता है, ‘श्री
कृपालु जी’ कहते हैं, वही मन श्यामसुन्दर की अनुकम्पा से प्रीति की रीति को
जान सकता है |
( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
प्रीति की रीति न सखि सब जान |
जो मन रह रत सुत वनितनि पति, सो न सकत पहिचान |
पुनि जो मन रह रत श्रुति कर्मन, सोउ मन जान अयान |
पुनि सोउ मन नहिं जानि सकत जो, निरत मुक्ति हित ज्ञान |
जो मन लोकन वेदन मुक्तिन, ह्वै विरक्त भज कान्ह |
सोइ ‘कृपालु’ तिन अनुकंपा ते, प्रीति - रीति उर आन ||
भावार्थ - अरी सखी ! प्रीति की रीति को बिरले ही जानते हैं | जो मन स्त्री, पुत्र, पति आदि में आसक्त रहता है वह नहीं समझ सकता, जो मन वेद - विहित कर्म धर्म में आसक्त रहता है वह भी नहीं समझ सकता | और वह भी नहीं समझ सकता जो अद्वैत - ज्ञान के द्वारा मुक्ति में आसक्त है | जो मन लोक - वेद एवं मुक्ति आदि से विरक्त होकर श्यामसुन्दर में आसक्त होता है, ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं, वही मन श्यामसुन्दर की अनुकम्पा से प्रीति की रीति को जान सकता है |
( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
जो मन रह रत सुत वनितनि पति, सो न सकत पहिचान |
पुनि जो मन रह रत श्रुति कर्मन, सोउ मन जान अयान |
पुनि सोउ मन नहिं जानि सकत जो, निरत मुक्ति हित ज्ञान |
जो मन लोकन वेदन मुक्तिन, ह्वै विरक्त भज कान्ह |
सोइ ‘कृपालु’ तिन अनुकंपा ते, प्रीति - रीति उर आन ||
भावार्थ - अरी सखी ! प्रीति की रीति को बिरले ही जानते हैं | जो मन स्त्री, पुत्र, पति आदि में आसक्त रहता है वह नहीं समझ सकता, जो मन वेद - विहित कर्म धर्म में आसक्त रहता है वह भी नहीं समझ सकता | और वह भी नहीं समझ सकता जो अद्वैत - ज्ञान के द्वारा मुक्ति में आसक्त है | जो मन लोक - वेद एवं मुक्ति आदि से विरक्त होकर श्यामसुन्दर में आसक्त होता है, ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं, वही मन श्यामसुन्दर की अनुकम्पा से प्रीति की रीति को जान सकता है |
( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
The
Fathomless ocean of the knowledge of all the Vedas, Scriptures and
Puranas the supreme Acharaya of this age Bhakti Yog-rasavatar, Jagadguru
Shree Kripaluji Maharaj is the personification of the nectar of
Braj-Ras, Divine Bliss.
While revealing the deepest
philosophies and devotional secrets of the Vedas and Scriptures, he has
used very simple language in his lectures. Shree Maharaji charming and
heart enticing style leaves a permanent impression in the hearts of the
loving devotees.
The revelation of the sweetest Divine Love of
Radha Krishna in the devotional songs written by Jagadguru Shree
Kripaluji Maharaj gives the experience of the Leelas of Radha Krishna to
sincere devoted souls.
The world’s spiritual seeker and those
who are thirsty for Divine Love make their life devotional through being
attracted to Shree Maharajji’s affectionate personality and satsang. As
I did, you, too, can experience the sweetness of his Divinity.
While revealing the deepest philosophies and devotional secrets of the Vedas and Scriptures, he has used very simple language in his lectures. Shree Maharaji charming and heart enticing style leaves a permanent impression in the hearts of the loving devotees.
The revelation of the sweetest Divine Love of Radha Krishna in the devotional songs written by Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj gives the experience of the Leelas of Radha Krishna to sincere devoted souls.
The world’s spiritual seeker and those who are thirsty for Divine Love make their life devotional through being attracted to Shree Maharajji’s affectionate personality and satsang. As I did, you, too, can experience the sweetness of his Divinity.
"कुसंग"
संसार मे सत्य एवं असत्य केवल दो ही तत्व हैं जिनके संग को ही सत्संग एवं
कुसंग कहते हैं। सत्य पदार्थ हरि एवं हरिजन ही हैं,अतएव केवल हरि,हरिजन का
मन बुद्धि युक्त सर्वभाव से संग करना ही सत्संग है। तथा उसके विपरीत
अवशिष्ट विषय हैं,सत्वगुण,रजोगुण एवं तमोगुण से युक्त होने के कारण मायिक
हैं, अतएव असत्य हैं। तात्पर्य यह हुआ की जिस किसी भी संग के द्वारा हमारा
भगवदविषय मे मन बुद्धि युक्त लगाव हो वही सत्संग है। इसके अतिरिक्त समस्त
विषय कुसंग हैं ।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।
संसार मे सत्य एवं असत्य केवल दो ही तत्व हैं जिनके संग को ही सत्संग एवं कुसंग कहते हैं। सत्य पदार्थ हरि एवं हरिजन ही हैं,अतएव केवल हरि,हरिजन का मन बुद्धि युक्त सर्वभाव से संग करना ही सत्संग है। तथा उसके विपरीत अवशिष्ट विषय हैं,सत्वगुण,रजोगुण एवं तमोगुण से युक्त होने के कारण मायिक हैं, अतएव असत्य हैं। तात्पर्य यह हुआ की जिस किसी भी संग के द्वारा हमारा भगवदविषय मे मन बुद्धि युक्त लगाव हो वही सत्संग है। इसके अतिरिक्त समस्त विषय कुसंग हैं ।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु जी।
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