Sunday, September 1, 2013

हे श्यामसुन्दर ! संसार में भटकते - भटकते थक गया। हे करुणा वरुणालय ! तुमने अकारण करुणा के परिणामस्वरूप मानव देह दिया , गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सम्मुख हो जाऊँ तथा अनन्त दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा-सदा के लिए मेरी दुःख निवृति हो जाए लेकिन यह मन इतना हठी है कि तुम्हरे शरणागत नहीं होता।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
एक साधक का प्रशन - मन से भक्ति कैसे की जाये ?

श्री महाराज जी द्वारा उतर - पहले सिद्धान्त समझिये। भक्ति दो प्रकार की होती है ----
१. वैधी और
२. रागानुगा

बुद्धि - प्रधान लोगों के लिए वैधी भक्ति। वे शास्त्र - वेदों में वर्णित वर्णाश्रम धर्म का पालन भी करें और भगवान् की भक्ति भी करें। मन -प्रधान लोग भावुक होते हैं वे केवल भगवान् की भक्ति करते हैं।


.......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
"हे श्यामसुंदर! संसार में भटकते भटकते थक गया। हे करुणा वरूनालय! तुमने अकारण करुणा के परिणाम स्वरूप मानव देह दिया ,गुरु के द्वारा तत्वज्ञान कराया कि किसी तरह तुम्हारे सन्मुख हो जाऊँ तथा अनंत दिव्यानन्द प्राप्त करके सदा सदा के लिए मेरी दुख निव्रत्ति हो जाये लेकिन यह मन इतना हठी है कि तुम्हारे शरणागत नहीं होता।"

Saturday, August 24, 2013

' गु ' शब्द का अर्थ माया का अन्धकार , ' रु ' शब्द का अर्थ नाश करना है। अर्थात जो माया रूपी अन्धकार का नाश कर दे वही गुरु है।
.......श्री महाराज जी।
Receiving a mantra from the Guru, massaging his feet, offering him worldly objects or lavishing false praises on him does not constitute true surrender.

केवल कान फूंका लेने मात्र से अथवा गुरूजी के पैर दबाने मात्र से , अथवा गुरु जी को सांसारिक द्रव्य देने मात्र से ,अथवा बातें बनाने मात्र से ,शरणागति नहीं हो सकती !!
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
गुरु मेटत अँधियार।
"Mind In 'God' And 'Body' In The World Is 'Karmyog' ; Whereas Bodily Worshipping God And Having Attachments In The World Is 'Absolute Ignorance'.
------JAGADGURU KRIPALUJI MAHARAJ."

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...