Friday, September 6, 2013

मायाबद्ध जीव का तो गोविन्द राधे !
तनु छुड्वाया जाय कष्ट हो बता दे !!

भावार्थ - मायाबद्ध जीव को शरीर छोड़ते समय असह पीड़ा होती है। सहस्त्रों बिच्छुओं के एक साथ काटने से जो पीड़ा होती है वही पीड़ा मायाधीन जीव को मृत्यु के समय होती है। मायाधीन जीव को शरीर छोड़ने को यमराज विवश करते हैं !
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
हे राधा गोविन्द..........
यदि संतो का संग मुझे नरक में प्राप्त हो तो मुझे नरक ही दे देना परन्तु कुसंग से युक्त स्वर्ग सम्राट इन्द्र का पद भी मुझे मत देना !

--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
One should not forget God in times of happiness and should realise His grace even in times of misery.
सुख का अनुभव करते समय भी भगवान् को मत भूलो तथा दुःखकाल में भी उनकी कृपा का अनुभव करो।
.......JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.
साधक को किसी से द्वेष भाव नहीं रखना चाहिये ! यदि हो जाये तो बार - बार उसका चिंतन न करे ! यदि है भी तो कथन में उसके सामने प्रकट न करे ! संसार में सब स्वार्थी हैं अतः इस विषय को लेकर किसी से द्वेष होना गलत है !
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
वास्तविक साधना गुरु आज्ञापालन ही है। जो कुछ प्राप्त होना है वह तो गुरु कृपा पर ही निर्भर है।

-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Sunday, September 1, 2013

बिना सद्गुरु की कृपा के इस संसार रूपी भवसागर से पार पाना मुश्किल ही नहीं, असम्भव है।
स्वयं से पूछो 'तुमने कितने घंटे साधना करने में लगाये? B.a ,M.a,M.ed करने में तो 10 गुणा समय दिया-पेट के लिए। ईश्वरीय काम के लिए कितने घंटे दिये?' और चाहते हो पूरा लाभ मिल जाये। कोई नगर तुम्हारे घर से 100 मील दूर है, तो दस मील चलने के बाद तुम खड़े क्यों हो गए? अरे और आगे चलो, नगर मिलेगा। रोड ठीक है, माइलस्टोन भी मिल रहें हैं। लेकिन अगर आपको रोड़ पर डाउट हो गया ,तो 10 मील जाकर लौट आए। फिर 10 मील दक्षि
...ण चले, फिर 10 मील उत्तर चले, फिर पश्चिम चले, इस प्रकार जीवन भर चलते जाओ, तो कभी भी लक्ष्य तक नहीं पहुचोंगे।
25 foot गड्ढा खोदा।निराश हो गया,"अजी यहाँ पानी नहीं है", और जगह खोदो। वहाँ भी 20 foot खोदा। यहाँ भी नहीं है। इस प्रकार करोड़ों foot खोदते जाओ। पानी नहीं निकलेगा। यदि लगातार एक जगह 50 foot और खोद डालते तो पानी निकल आया होता। अगर वास्तविक महापुरुष मिल जाये, तो कुछ भी असम्भव नहीं। अनन्त नगण्य जीव महापुरुष बने हैं। तुम क्यों नहीं बन सकते?

--------जगद्गुरु श्री कृपालुजी ।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...