Wednesday, September 11, 2013

जब निष्काम भाव से जीव हरि - गुरु की भक्ति करता है तब दयालु गुरु उस जीव को श्यामा श्याम का दिव्य प्रेम दान करते हैं.

--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
आप लोग शायद नहीं जानते आपके ह्रदय में भगवान् नित्य रहते हैं , लेकिन कोई फायदा नहीं ! सुनते हैं रहते हैं , रहते हैं अब आइडियाज (ideas) नोट करते हैं ! हाँ मानते नहीं ! अगर मान लें तो पाप कैसे करें ?अगर मान लें कि वो हमारे ह्रदय में हैं तो हम प्राइवेसी (privacy) जो रखते हैं अपनी , अपनी बीबी के खिलाफ सोच रहे हैं उसके बगल में बैठ कर , आपने ही बाप के खिलाफ सोच रहे हैं उसके ही पास में बैठ कर , अपने ही गुरु के खिलाफ भी सोचने लगते हैं , उन्ही के सामने बैठ कर के ! और तो और भगवान् को भी नहीं छोड़ते ! ये क्या भगवान् भगवान् भगवान् लगा रखा था ! उसके नौ बच्चे थे दसवाँ हुआ है आज ! हमारे एक बच्चा था मर गया ! क्या भगवान् का न्याय है तुम्हारे ! इसमें भगवान् क्या करें भाई ? ये तो तुम्हारे कर्म के हिसाब से फल मिलता है ! लेकिन अल्पज्ञ जीव अपनी अल्पज्ञता का स्वरूप दिखा देता है।

..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
"Always keep your mind absorbed in Radha Krishn and your beloved Spiritual Master."
सच्चा साधक ------

1- द्वेष करने वाले व्यक्ति के प्रति भी द्वेष न करें ! उदासीन रहें !

2- आज कोई नास्तिक भी है , तो कल उच्च साधक बन सकता है ! अतः साधक यह न सोचे कि इसका पतन सदा के लिए हो चुका ! सूरदास आदि संत उदाहरण हैं !

3 - गुरु की सेवा करने वाला तो साधक ही है , उसके प्रिय होने के कारण उससे द्वेष करना पाप है !

4 - सचमुच भी कोई अपराधी हो तो भी मन से भी उसके भूतपूर्व अपराधों को न सोचें , न बोलें !

5 - संसार में भगवत्प्राप्ति के पूर्व सभी अपराधी हैं ! बड़े - बड़े साधकों का भी पतन एवं बड़े - बड़े पापियों का भी उत्थान एक क्षण में हो सकता है !

6 - सब में श्री कृष्ण का निवास है , अतः उनको ही महसूस करें !

**********जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ***********
कमर कस कर जिद कर लो कि मुझे अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण से मिलना ही है ! इसी जन्म में ही , नहीं - नहीं इसी वर्ष , नहीं - नहीं आज ही मिलना है ! यह व्याकुलता बढ़ाना ही वास्तविक साधना है ! इस प्रकार यह व्याकुलता इतनी बढ़ जाय कि अपने प्रियतम के बिना एक क्षण भी युग के सामान बीतने लगे , बस यही साधना की चरम सीमा है ! इसी सीमा पर भगवत्कृपा , गुरु कृपा द्वारा दिव्य प्रेम मिलेगा !

..............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु .
There is no one in this world who attains worldly possessions and is not intoxicated.
..........SHRI MAHARAJJI.
"Meditation in raganuga bhakti is not a physical disciplinary act of concentration in the brain area. Meditation means feeling the Divine presence of Radha Krishn or your Spiritual Master near you."

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...