Monday, March 17, 2014

कोई महापुरुष हो , चाहे राक्षस हो। अपने मन में दूसरे के प्रति हमेशा अच्छी भावना होनी चाहिये। जिससे अच्छे विचार अंतःकरण में आवें। वो जो है, वो तो रहेगा ही। वो राक्षस होगा, तो राक्षस रहेगा। महापुरुष होगा तो महापुरुष रहेगा। हम अपने अंदर अगर दुर्भावना लाते हैं तो हमने तो अपना अंतःकरण बिगाड़ लिया। अब भगवान् जो थोड़ा पैर रखे आने के लिए एबाउट टर्न चल दिये। वो कहते हैं - क्योंकि तुम तो औरों को बुलाते हो , इसलिये मैं नहीं रहता ऐसे घर में।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!

कर्मयोग की अवधि में यथा सम्भव मौनव्रत का पालन किया जाये सदा ध्यान रहे कि किसी कार्य से दूसरे को बाधा न पहुँचे।
!! श्री महाराज जी !!

भक्त जैसा चाहे गोविन्द राधे। भगवान् वैसा ही रूप बना दे ।।
राम कृष्ण हरि एक गोविन्द राधे। जामें लगे मन वामें लगा दे।।
.........श्री महाराज जी।

The devotion done with your heart and mind is the main treasure which you earn. Whenever you take God’s name with loving remembrance even once, that is your earning. No one can spoil it. No one can take it away from you.
-----SHRI MAHARAJJI.

It is only in the human form that man can attain freedom from material bondage through practise of spiritual discipline.
केवल मानवदेह में उन्नति करके अपने कर्मबन्धनों से छुटकारा पाने का सौभाग्य प्राप्त है।
-----SHRI MAHARAJ JI.

जो जीव हरि एवं गुरु में एक भावना रख कर निष्काम भक्ति करता है वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।
---------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

अश्रद्धालु एवं अनाधिकारी से भगवतचर्चा करना कुसंग है।
------श्री महाराजजी।
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...