Tuesday, March 18, 2014

You will be surprised to know that divine love, which overwhelms even the paramahamsas (a person whose mind is absorbed in the self, i.e. he has reached the final stage of jnana) in special ecstasy, is not something that can be practiced, nor does it come by itself. Divine love is actually the name of one of the most intimate powers of God. It is He alone who possesses this divine power. There is no price that can be paid for this priceless attainment.
...........JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

हमारे प्यारे श्री महाराजजी (जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु) तो सदा से ही हम पर निगरानी रखते हैं। हमारे हर संकल्प हर क्रिया को हर क्षण हमारे साथ रहकर देखा करते हैं। यह हमारी कमी है कि हम उन्हें अपने साथ सदा महसूस नहीं कर पाते। बस पूर्ण दीनातिदीन होकर अपनी इंद्रिय,मन,बुद्धि को उनके चरणों में सदा-सदा के लिए चढ़ा दो। केवल उनकी आज्ञा ही हमारा चिंतन और उसका पालन ही हमारा काम है। बस इतनी साधना है। इसी बात पर आँसू बहाकर उनके चरणों को धोकर पी लो कि हम उन्हें सदा साथ-साथ महसूस क्यों नहीं करते।

Your rise and fall depend on your thinking.so do not keep your mind idle.do not let it be influenced by the company of the wrong people. Do not listen to the wrong people. Throw out all their words which you have heard, just as you spit out the grit which was mixed with your food.
Always retain the thought of your 'GURU' in your mind and heart.

******Jagadguru Shri Kripalu Mahaprabhu"******

भुज पसारी....., कब ते पिय परखत............!!
"Dear souls, do devotion, do devotion, do devotion."
-----SHRI MAHARAJ JI.

Monday, March 17, 2014

जिनके चरण कमलों की रज श्यामा श्याम प्रेम रस से पूर्ण है। वह अमर मूल ( संजीवनी बूटी ) के समान समस्त भव रोगों की औषधि है ,
ऐसे सद्गुरु बैध को सर्वस्व समर्पण करते हुए सहस्रों सहस्रों प्रणाम।

देखिये ! संसार में चौरासी लाख प्रकार के शरीर हैं उसमें केवल मनुष्य शरीर ऐसा है जिसमें हम साधना के द्वारा दुःखों से छुटकारा पाकर आनंद प्राप्त कर सकते हैं। बहुत बार आप लोगों को बताया गया है कि इसलिये देवता भी इस मानव देह को चाहते हैं । सात अरब आदमियों में सात करोड़ भी ऐसे नहीं हैं जिनके ऊपर भगवान् की ऐसी कृपा हो कि कोई बताने बाला सही - सही ज्ञान करा दे कि क्या करने से तुम्हारे दुःख चले जायेंगे और आनंद मिल जायेगा। और जिन लोगों को ये सौभाग्य प्राप्त हो चुका है , ये जान चुके हैं किसी महापुरुष से वे लोग भी फिर चौरासी लाख का हिसाब बैठा रहे हैं। क्यों ? उत्तर है , लापरवाही ।
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...