This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Friday, March 21, 2014
"No
one can really know God. He is not perceivable to the physical senses.
Yet, many souls have attained Him. He has a very important quality of
being causelessly merciful. It is only with His grace that the souls can
know Him or attain Him. But, we have to do devotion to obtain this
grace. Do not procrastinate, life is short and death can knock on our
door any time."
( भक्ति का वास्तविक स्वरुप )
भक्ति में अनन्यता परमावश्यक है । केवल श्रीक्रुष्ण एवं उनके नाम, रुप, गुण, लीला,धाम तथा गुरु में ही मन का लगाव रहे । अन्य देव, मानव या मायिक पदार्थ में मन का लगाव न हो । इसका तात्पर्य यह न समझ लो कि संसार से भागना है ।वास्तव में संसार का सेवन करते समय उसमें सुख नहीं मानना है । श्रीक्रुष्ण का प्रसाद मान कर खाना पानी एवं व्यवहार करना है । यह समस्त ज्ञान सदा साथ रखकर सावधान होकर साधना भक्ति करने पर शीघ्र ही मन अपने स्वामी से मिलने को अत्यन्त व्याकुल उठेगा । बस यही व्याकुलता ही भक्ति का वास्तविक स्वरुप है.
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
भक्ति में अनन्यता परमावश्यक है । केवल श्रीक्रुष्ण एवं उनके नाम, रुप, गुण, लीला,धाम तथा गुरु में ही मन का लगाव रहे । अन्य देव, मानव या मायिक पदार्थ में मन का लगाव न हो । इसका तात्पर्य यह न समझ लो कि संसार से भागना है ।वास्तव में संसार का सेवन करते समय उसमें सुख नहीं मानना है । श्रीक्रुष्ण का प्रसाद मान कर खाना पानी एवं व्यवहार करना है । यह समस्त ज्ञान सदा साथ रखकर सावधान होकर साधना भक्ति करने पर शीघ्र ही मन अपने स्वामी से मिलने को अत्यन्त व्याकुल उठेगा । बस यही व्याकुलता ही भक्ति का वास्तविक स्वरुप है.
----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.
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