Sunday, March 30, 2014

मान ले उनको तू सिर्फ़ अपना.......सीख़ ले याद में बस तड़पना.........वे लगा लेंगे सीने से तुझको.......वे लगा लेंगे सीने से तुझको.........वे 'कृपालु' हैं तंगदिल नहीं हैं...........!!

THE MANY COLORS OF 'PREM MANDIR' IN VRINDAVAN DHAM.

"The absolute essence of all the Divine philosophies is to attach yourself in loving remembrance of your soul beloved krishna with a growing desire to serve Him more and more."
............SHRI MAHARAJJI.

प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है श्रीकृष्ण भक्ति। श्रीकृष्ण को धारण करने के लिये 'श्रीकृष्ण भक्ति' की रस्सी पकड़ो। वह भक्ति की रस्सी श्रीकृष्ण के हाथ में है। उसी रस्सी को पकड़ लो , वे खींच लेंगे। ऐसे ही जम्प करके ऊपर जाने की चेष्टा न करो। गिरोगे , सिर फट जायेगा।
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

आँसू बहाने से अन्तःकरण शुद्ध होगा, याद कर लो सब लोग, रट लो ये कृपालु का वाक्य। भोले बालक बनकर रोकर पुकारो, राम दौड़े आयेंगे। सब ज्ञान फेंक दो, कूड़ा-कबाड़ा जो इकट्ठा किया है। अपने को अकिंचन, निर्बल, असहाय, दींन हीन, पापात्मा महसूस करो, भीतर से, तब आँसू की धार चलेगी, तब अन्तःकरण शुद्ध होगा, तब गुरु कृपा करेगा। गुरु की कृपा से राम के दर्शन होंगे, राम का प्यार मिलेगा और सदा के लिये आनन्दमय हो जाओगे।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

प्रश्न: परमार्थ के पथ पर चलने वाले साधक को क्या अपने भविष्य की चिंता करनी चाहिए ?
उत्तर: श्री महाराजजी द्वारा :- नहीं। क्योंकि जो कुछ प्रारब्ध में होगा वही उसे प्राप्त होगा । परमार्थ के पथ पर चलने वाले को चिंता किस बात की ,अगर कोई कहे की भविष्य की चिंता नहीं करेंगे तो मर जाएंगे ,यह कैसे हो सकता है ,जब भगवान के वो शरणागत है और शरणागत का योगक्षेम स्वयं भगवान वहन करते हैं।

सुप्रीम पावर पूर्णतम पुरुषोतम ब्रह्म श्रीकृष्ण ही वास्तविक नित्य अनन्त मात्रा के प्रकाश हैं शेष सब अंधकार का स्वरूप हैं। जड़ स्वरूप हो चाहे चेतन हो चाहे कुछ भी हो।
.............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...