Tuesday, April 1, 2014

Bhakti is eternal it is the eternally existing path to attain God.God is one, so the path of his attainment is also one, and thus, the same path of bhakti ensures the attainment of any of the forms of God.
The path of bhakti is prevalent in every brahmand of this entire universe and it is for all souls of this universe. It remain the same in all the four yugas (satyug, treta, dwapar and kaliyug) and, as it is directly related to soul and God, it is above caste, creed, sect and nationality. It can be adopted by any person of any nation of this world, because it is gifted by the supreme god himself for the benefit of the humankind; and again there are no physical requirements in doing bhakti.

There are no meditation postures to adopt, no concentration techniques to follow and no ritules to observe. so it can be alone by anyone young, old or sick and at any time in twenty-four hours, because bhakti is the pure love of your heart that longs to meet the Divine beloved of your soul in this very lifetime
........JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

तुम्हारी जिस वस्तु में सबसे अधिक आसक्ति हो, उसी को भगवान को अर्पण कर दो । इससे तुम्हारी आसक्ति कम हो जाएगी । आसक्ति ही भगवदक्षेत्र में बाधा डालती है। तुम्हारी आसक्ति किस मेँ है ,यह जानने के लिए, चिंतन द्वारा पता लगाओ, तत्पश्चात उस वस्तु का समर्पण कर दो।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

संसार में सभी चीजे सहीं हैं ,गलत कुछ भी नहीं हैं। आपको अपने लिये देखना है कि हमारे लिये अनुकूल क्या है।
------श्री महाराज जी।

हरि गुरु की सेवा से, हरि गुरु के निरंतर स्मरण से हमारा अन्तः करण शुद्ध होगा ।
ये प्रतिज्ञा कर लो सब लोग की जब आपस मे मिलो तो केवल भगवद् चर्चा करो और यदि दूसरा न करे तो वहाँ से तुरंत चले जाओ, हट जाओ । इस प्रकार कुसंग से बचो । जो कमाइए उसको लॉक करके रखिए, लापरवाही मत कीजिये।

...........श्री महाराजजी।
श्री महाराज जी अपने सम्पूर्ण साहित्य एवं प्रवचन द्वारा पुनः पुनः यही सिद्धान्त जीवों के मस्तिष्क में भर रहे हैं। उनके मतानुसार ब्रहम जीव माया तीन तत्व सनातन हैं , किन्तु जीव एवं माया दोनों ही ब्रहम की शक्ति हैं। ब्रहम श्री राधाकृष्ण का दिव्य प्रेम प्राप्त करना साध्य एवं उनकी ही निष्काम भक्ति करना ही साधना है।

साधक जब तक पूर्ण श्रद्धायुक्त नहीं होगा , वो ज्ञान का ग्रहण नहीं कर सकता। अगर पूर्ण श्रद्धा नहीं है, संशय है तो उसका सर्वनाश सुनिश्चित है। यानि वो संत पर दुर्भावना कर बैठेगा।
यह बाबाजी कैसे हैं? कैसे हैं? सोचेगा, जैसा हम चाहते हैं, ऐसा बाबा होना चाहिये। हर आदमी इतना बड़ा मूर्ख है कि वो अपनी राय के अनुसार संत चाहता है।

------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

बचपन में ही भक्ति में लग जाओ तो युवा अवस्था का नशा हावी नहीं होगा,फ़िर संस्कार बन जायेंगे तो भगवान की और युवा अवस्था में भी चलोगे।
.........श्री महाराजजी।


मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...