Sunday, April 6, 2014

स्मरण एक मिनिट तो क्या एक क्षण से शुरू होता है। इसे बढ़ाना ही 'साधना' है। इस एक क्षण के 'स्मरण' को 'मरण' तक बढ़ाते ही रहना है।
..........श्री महाराज जी।

श्रद्धा , सत्संग , एवं हरिभक्ति , यह तीनों हरि की प्राप्ति कराने में हेतु हैं।
.......श्री महाराज जी।

जिन्होंने अपना समस्त जीवन जीव कल्याणार्थ समर्पित कर दिया , जो हर पल जीवों को प्रेम रस परिप्लुत करने के लिए लालायित रहते हैं ,
ऐसे प्रेमानन्द में निमग्न प्रेममूर्ति
श्री कृपालु जी महाप्रभु को कोटि कोटि प्रणाम !

जिन्दगी उसी की महान है, जो गुरु के सुख में बीतती रहे।
......श्री महाराज जी।

कोशिश करने पर अवश्य ही दोष कम होते हैं। लेकिन जब कोशिश ही कम होती है तब दोष भी कम ठीक होते हैं। गलती तो सभी से होती है , लेकिन बार - बार कहने पर भी गलती हो , यह सबसे बड़ी मिस्टेक है।
लोगों को दूसरों की तो बड़ी भारी फिक्र है लेकिन हमारा क्या होगा , इसकी फिक्र क्यों नहीं करते हो।

………जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

करू मन छिन - छिन , हरि - गुरु सुमिरन ।
जाने कब जाय छिन , सुर दुर्लभ तन ।।
---श्री महाराज जी।

Saturday, April 5, 2014

अगर हम ये सदा महसूस करें कि वो अंदर बैठे हैं और नोट करते हैं, एक अपराध नहीं कर सकता कोई,एक बात गलत नहीं सोच सकता कोई।
-----श्री महाराज जी ।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...