Tuesday, April 8, 2014

परमार्थ के मार्ग पर चलने वाले को भविष्य की चिन्ता कैसे? वह तो भगवान के शरणागत है,और शरणागत जीव का योगक्षेम भगवान स्वयं वहन करते हैं।
..........श्री महाराजजी।

विचार कीजिये!
आज धन है, कल नहीं है, आज बल है, कल बुढ़ापा आ गया, आज रूप है कल कुरूप हो गये, जो कुछ है सीमित है वह भी एक सा नहीं रहेगा। और फिर एक दिन सारा का सारा जीरो(zero) हो जायेगा और लोग कहेंगे- आज वह चला गया।
------'श्री कृपालु गुरुदेव ' के श्रीमुख से।

HAPPY RAMNAVMI TO ALL DEAR FRIENDS.......
JAI-JAI SHRI RAM.
जय राघवेन्द्र सरकार की, जय दशरथ प्राणाधार की।
जय सतचित सुखघन सार की, जय कोटि काम बलिहार की।
जय नील जलद तनु धार की, जय कोटि काम बलिहार की।
जय सकल जगत करतार की, जय सीता के भरतार की।

.......श्री कृपालु जी महाप्रभु।

अवध के राम बने ब्रज श्याम |
लखन बने बलराम जानकी, राधारानी नाम |
त्रेता में बड़भ्रात राम भये, द्वापर में बलराम |
मुकुट, ग्रीव, कटि, पद टेढ़ो करि, प्रकटे चंचल राम |
योगारूढ़ जीव हित कीन्ही, लीला रास ललाम |
पग पलुटावति सदा जानकी, रामहिँ येहि ब्रजधाम |
इनमें भेद ‘कृपालु’ मान जो, नरकहुँ नाहीं ठाम ||

भावार्थ - अयोध्या के भगवान राम ही ब्रज में श्याम बनकर प्रकट हुए | लक्ष्मण जी बलराम बन गये एवं श्री जानकी जी राधारानी के नाम से प्रख्यात हुईं | त्रेता में बड़े भाई राम हुए एवं द्वापर में बड़े भाई बलराम हुए | भगवान राम ब्रज में मुकुट, गर्दन, कमर एवं पैरों को टेढ़ा करके चंचल स्वभाव से प्रकट हुए एवं मायातीत जीवों के लिए आदर्श स्थापित करते हुए दिव्य रासलीला का अभिनय किया | ब्रज में श्री जानकी जी ने भगवान राम से अपने चरण दबवाये | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि इन दोनों में जो भेदभाव रखता है वह नामापराधी है, उसको नरक में भी स्थान नहीं मिल सकता |
( प्रेम रस मदिरा सिद्धान्त - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

Monday, April 7, 2014

Shri Maharaj Ji constantly reminds us
Since you will one day have to leave the world, renounce it right now and attach it to God. One day you will have to go to the beloved’s house (Golok); therefore renounce the paternal home (material world) from your mind.

Shri Maharaj Ji reminds us:
Who knows when Yamraj will come! We must be in a hurry to loot the treasure of Divine Love and keep the mind engaged in the Godly subject so that the mind may think of God in the last minute also.

It is God's promise that He will accept and love the individual soul in the same manner that the individual soul loves Him.
..........SHRI MAHARAJJI.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...