Thursday, April 10, 2014

ऊधो !, जाय कह्यो तुम वाय |
इक इक द्वै ह्वै जात जान सब, पै द्वै ह्वै इक आय |
जग प्रसिद्ध यह चोर चोर दोउ, मौसियाउतहिं भाय |
जस वे माधव तस तुम ऊधव, अंतर कछु न जनाय |
उनने उर विरहाग लगाई, तुम लै घृत छिरकाय |
मोहिं ‘कृपालु’ नहिं कहन सुनन वे, करैं जोइ मनभाय ||

भावार्थ – ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव ! तुम उनसे जाकर कह देना कि यह तो सभी जानते हैं कि एक – एक मिलकर दो हो जाता है किन्तु यहाँ पर दो मिलकर एक होकर आये हैं अर्थात् तुम दोनों एक ही समान हो संसार में यह कहावत प्रसिद्ध है कि चोर – चोर मौसियावत भाई होते हैं | हे उद्धव ! जैसे माधव हैं वैसे तुम भी हो | तुम दोनों में कोई अंतर नहीं उन्होंने हृदय में विरह की आग लगा दी और तुम उसके ऊपर घी का छिड़काव करने आये हो | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मुझे कुछ कहना सुनना नहीं है | उन्हें जो अच्छा लगे वही करें |
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.

श्री महाराजजी से साधक का प्रश्न: जब हम अपने दोस्त,रिश्तेदार आदि को भगवद विषय समझाने का प्रयत्न करते हैं तब समझने के बजाय कभी-कभी वे और अकड़ जाते हैं। इससे हमे बहुत दुख होता है। ऐसे में हम क्या करें?
श्री महाराजजी द्वारा उत्तर: अश्रद्धालु एवं अनाधिकारी से अपने मार्ग अथवा साधना आदि के विषय में वाद-विवाद करना भी कुसंग है,क्योंकि जब अनाधिकारी को सर्वसमर्थ महापुरुष भी आसानी के साथ बोध नहीं करा पाता,तब साधक भला किस खेत की मूली है। यदि कोई परहित की भावना से भी समझाना चाहता है,तब भी उसे ऐसे नहीं करना चाहिए,क्योंकि अश्रद्धालु होने के कारण उसका विपरीत ही परिणाम होगा। साथ ही अश्रद्धालु के न मानने पर साधक का चित्त अशांत हो जाता है।
शास्त्रानुसार भी भक्तिमार्ग को लेकर वाद-विवाद करना घोर पाप है। अतएव न तो वादविवाद सुनना चाहिए,न तो स्वयं करना चाहिए। यदि अनाधिकारी जीव इन विषयों को नहीं समझता ,तो इसमें आश्चर्य या दुख भी नहीं होना चाहिए,क्योंकि कभी तुम भी तो नहीं समझते थे। यह तो परम सौभाग्य महापुरुष एवं भगवान की कृपा से प्राप्त होता है कि जीव भगवदविषय को समझकर उसकी और उन्मुख हो।
अनाधिकारी को भगवदविषयक कोई अंतरंग रहस्य भी न बताना चाहिए,क्योंकि वर्तमान अवस्था में अनुभवहीन होने के कारण अनाधिकारी उन अचिंत्य विषयों को नहीं समझ सकता। उलटे अपराध कमाकर अपनी रही सही अस्मिता को भी खो बैठेगा। साथ ही अंतरंग रहस्य बताने वाले साधक को भी अशांत करेगा।

जो सेंट परसेंट आज्ञा पालन करने के लिये तैयार नहीं है ,वह कैसे आगे बढ़ने की आशा कर सकताहै?
..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

सोचिए हम कितने सौभाग्यशाली हैं ………………
श्री भगवान की महती अनुकम्पा से लाखों योनियो मे से कुछ जीवो को मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। इस मनुष्य शरीर मे भी कई हजार लोगो मे कोई एक वेद सम्मत धर्म कर्म मे रुचि रखता है। ऐसे कई हजार लोगो मे कोई एक निश्चित और प्रमाणिक पथ का अनुसरण कर भगवतप्राप्ति की ओर उन्मुख होता है। ऐसे कई हजार जिज्ञासु जीवो मे किसी एक को वास्तविक श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ महापुरुष की प्राप्ति होती है और ऐसे कई हजार गुरु कृपा प्राप्त साधको मे कोई एक रसिक महापुरुष अर्थात गोपी प्रेम प्राप्त महापुरुष का सत्संग प्राप्त करता है। इससे ही ज्ञात होता है कि ब्रजरस के मुर्तिमान स्वरुप स्वामी श्री कृपालु महाप्रभु का सत्संग कितना दुर्लभतम है। श्री महाराजजी अपनी उदारता, दानशीलता और कृपा के लिए विश्व प्रसिद्ध है। उनका ऐसा स्वभाव है कि वे अकारण ही जीवो पर अनवरत कृपा करते रहते हैं ।
सोचिऐ ऐसे रसिक शिरोमणि गुरु के हमारे लिए सहज सुलभ हो जाने पर भी हम उनकी आज्ञापालन मे क्यों लापरवाही कर रहे है????

गुरु का एक ही अर्थ है, जो तुम्हारी नींद तोड़ दे। और नींद का टूटना हमेशा दु:खद है। जो भी तुम्हारी नींद तोड़ेगा, उसपर तुम नाराज़ होओगे, क्योंकि वह तुम्हें बेचैनी में डाल रहा है। इसलिए गुरु शुरु में तो कष्टदायी मालूम पड़ता है, दु:खदायी मालूम पड़ता है, परंतु बाद में परम सुखदायी है।

Wednesday, April 9, 2014

दास का धर्म केवल दासता करना, सेवा करना और सेवा करने का मतलब जिससे स्वामी को सुख मिले.....जिससे 'स्वामी को सुख मिले'... रट लो...भगवतप्राप्ति तक काम देगा..यहीं तो सारी गड़बड़ हो रही है।
.......... श्री महाराजजी।

संसार में जो सुख या दुःख हमें मिलता है, वो हमारा माना हुआ सुख या दुःख है। वास्तविकता में संसार की किसी वस्तु या व्यक्ति में न सुख है, न दुःख। जिस वस्तु में हम सुख मान लेते हैं, उस वस्तु के मिलने पर हमें सुख मिलता है और यदि वो वस्तु न मिले या छिन जाये, तो हम दुःखी हो जाते हैं। अतः संसार में सुख दुःख दोनों नहीं हैं। यदि हम कहीं सुख न मानें तो किसी से दुःख नहीं मिलेगा।
------ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...