Monday, April 14, 2014

जीव न मरता है न पैदा होता है।
ये जीव न मरता है न पैदा होता है। तो रमेश न तो बना है और न मरा है। वो आया था ओ चला गया ऐसा बोलो। जैसे हम संसार से बोलते हैं न अरे वो रमेश बम्बई से आज आया था एक घण्टे बाद चला गया। तो, इसका मतलब मरा तो नहीं। नहीं नहीं। आया था बम्बई से एक घण्टे बाद चला गया। ऐसे ही ये जीव माँ के पेट में शरीर में अाया था और आज इस शरीर को छोड़कर चला गया। तो जीव भी नित्य है , भगवान भी नित्य हा और माया जड़ होते हुये भी नित्य है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

Your mind itself is the obstacle between you and God,and your mind itself is the medium of finding God.
.......SHRI MAHARAJJI.

हरि गुरु एक मानो रहो गुरुधामा |
अनुकूल चिन्तन करो आठु यामा ||

हरि गुरु को एक मानते हुये गुरुधाम में निवास करो | सदैव गुरु के अनुकूल ही चिंतन करो |
नाम अपराध जनि करो गुरुधामा |
अन्यथा नरक में भी मिले नाहिं ठामा ||

गुरुधाम में जाकर नामापराध से सावधान रहना चाहिये अन्यथा नरक में भी स्थान नहीं प्राप्त होगा |
आदेश पालन हो सदा गुरुधामा |
आदेश पालन ते मिलें श्याम श्यामा ||

साधक को बड़ी सावधानी से सद्गुरु के आदेश का सदा पालन करना चाहिये | गुरु आदेश-पालन से ही श्यामा-श्याम की प्राप्ति होगी |
....(श्यामा श्याम गीत)---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

अभ्यास के द्वारा महापुरुष बन सकते हैं।
बड़े - बड़े पापात्मा जो राम नहीं कह सकते थे वाल्मीकि वगैरह ये महापुरुष कैसे हो गये ? बस प्रतिज्ञा कर लिया। आज हम ऐसा ही करेंगे। बड़े - बड़े कामी , क्रोधी , लोभी , अभ्यास के द्वारा महापुरुष बन गये। साँप को रस्सी समझ कर तुलसीदास गये अपनी बीबी के पास , इतने कामान्ध लेकिन प्रतिज्ञा कर लिया। राम के भक्त हो गये। तो ये सब बातें अभ्यास से ही जायेंगी , लेकिन लापरवाही नहीं करनी चाहिये।
………जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।
Shri Radha, the bliss-imparting power (hladini shakti) of Shri Krishna, teaches the lesson of divine love. No one loves or pleases Krishna like She does. Supremely selfless in Her devotion to Him, She gives no thought to Her own happiness, but only to His. To serve Him is the aim of Her existence and to please Him, Her joy.
.......SHRI MAHARAJ JI.

एक साधक का प्रश्न - क्या प्रेम किसी साधना से मिल सकता है ?
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर :- असंभव...... श्री कृष्ण का प्रेम नित्य सिद्ध है , वो साधन साध्य नहीं है ! कोई भी साधन श्री कृष्ण प्रेम का मूल्य नहीं हो सकता ! क्योंकि वो प्रेम तो दिव्य है जिसके स्वयं श्री कृष्ण भी आधीन रहते हैं ! तो कौन साधन से कोई उसको पा लेगा ? क्योंकि साधन जो भी होगा , वो इन्द्रिय ,मन , बुद्धि से होगा अर्थात मायिक होगा ! उस मायिक साधना से दिव्य वस्तु कैसे मिलेगी ? भगवान् ही नहीं , उनका दर्शन भी असंभव है फिर उनका प्रेम तो और भी अधिक मूल्यवान है !

भगवान् से बड़ा कोई प्रिय नहीं है।
उसको पैदा होने के दबाव में , इतना कष्ट हुआ उस कष्ट को निकलने के लिये रोता हैं।
हमारा बाप मर गया , माँ मर गई , पति मर गया , बीबी मर गई बेटा मर गया। हम रोते हैं। क्यों रोते हैं ....... उसके वियोग के दुःख का जो टेम्प्रेचर { temperature } अन्दर आया उसको डाउन करने को , निकालने को। उससे शान्ति मिलती है , सुख मिलता है। तो हर क्रिया आनंद के लिये है। क्योंकि हम आनंद के अंश हैं। इसलिये हमारी आत्मा जो है सबसे प्रिय है अब उसका भी प्रिय भगवान् है। अब भगवान् से बड़ा कोई प्रिय नहीं है।
इसलिये उसको प्रियतम कहते हैं। स्वाभाविक हमारा सबसे प्रिय है , बनवाटी नहीं। बाकी सब बनावटी हैं। माँ से प्यार कितना दिन करोगे। जब तक जिन्दा है। मर गई तो प्यार खतम हो जाता है। अरे फिर भी हम करते रहेंगे जी।
और तुम मर गये तो........ तो पता नहीं कौन हमारी माँ थी दूसरी माँ बनेगी। हम कुत्ता बनेंगे तो कुतिया हमारी माँ बनेगी। हम गधा बनेंगे तो गधी हमारी माँ बनेगी।

.............जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...