Tuesday, April 15, 2014

श्रद्धा , सत्संग , एवं हरिभक्ति , यह तीनों हरि की प्राप्ति कराने में हेतु हैं।
.......श्री महाराज जी।

भर भर के पी ले मय पर पैमाना साथ न लाना, दोनों जहाँ की ख्वाहिश दिल में रहे न तिल भर, पैमाना ये ही लेकर मयकश कदम बढ़ाना, इनका नशा है ऐसा उतरे न ता क़यामत,
बढ़ता रहे हमेशा खाली न हो खजाना, इक बात है "कृपालु " यारों नशे में इसके,
शाहाना ठाठ बाहर भीतर मगर दीवाना ..............!!!

राधे-राधे।

Monday, April 14, 2014

वे सदैव हमारी रक्षा करते रहे हैं, वर्तमान में भी कर रहे हैं। हम नहीं जानते हम किस खतरे में पड़ जाते अब तक?
-----श्री महाराजजी।

तुम मुझे अब याद नहीं आते.......!
तुम मुझे अब याद हो गये हो..........!!
राधे-राधे।

We cannot buy back even one minute of lost time, even if we possess all world’s wealth. Therefore, time should not be squandered in unnecessary sense gratification. We should instead fully dedicate our every thought, word, and deed in all times, places, and circumstances to awakening our dormant devotion to HARI-GURU. This is the proper utilization of the human form of life.
--------Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.

मेरे खामोश होठों पर मोहब्बत गुनगुनाती है............!
मैं तेरा हूँ,तुम मेरे हो......यही आवाज़ आती है.....................!!
राधे-राधे।
हम आनंद रुपी भगवान् के अंश हैं.........
तो ये सब बेचारे भिखमंगे हैं। इनके पास प्रेम नहीं है ये स्वार्थ के लिये प्रेम करते हैं। और जहाँ स्वार्थ है , वहॉँ का। प्रेम प्रेम है ही नहीं। क्योंकि स्वार्थ काम सिद्ध हुआ तो प्रेम घाट गया। स्वार्थ बिलकुल नहीं सिद्ध हो रहा है प्रेम खतम हो जाता है। उसकी आधारशिला गलत है इसलिये वो प्रेम टिकाउ कैसे रहेगा।
चाहे माँ का प्रेम हो , चाहे बाप का , चाहे बीबी का , चाहे किसी वस्तु का हो। तो सबसे प्रिय वस्तु आत्मा है। आत्मा से वैराग्य किसी को नहीं होगा। देखने का , सुनने का , सूंघने का रस लेने का सामान क्यों चाहते हो। केवल एक कारण है , आत्मा को सुख मिलता है। तो आत्मा का सुख क्यों चाहते हो ?
उसका कोई कारण नहीं जानते हम कि हम आत्मा का सुख क्यों चाहते हैं।
दूसरे का सुख क्यों नहीं चाहते अपनी आत्मा का सुख क्यों चाहते है ? इसलिये चाहते हैं कि हम आनन्द रुपी भगवान् के अंश हैं।

-------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...