Saturday, April 19, 2014

All the knowledge in the world, right from the worldly to the Vedic, attempt to answer these two questions, "What do we want and how do we attain it?" How surprising it is that in countless lives, we have not been able to answer them.
.......SHRI KRIPALU MAHAPRABHU JI.

अपने पूरे हृदय के साथ अपने को भगवान् के हाथों में समर्पित कर दो, तुरंत के पैदा हुए बच्चे जैसे बन जाओ, यही आत्म समर्पण है।
Put yourself with all your heart and strength into the hands of God.This is Self Surrender.

-------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

मन को बाँधों। मन के दास न बनो। कुसंग से सदा बचो तथा मन को सदा अपने गुरु में ही लगाये रहो।
मन के हारे हार है , मन के जीते जीत।

~~~~ श्री महाराज जी।

शास्त्र गुरु वचनों में गोविंद राधे।
पूर्ण विश्वास ही है श्रद्धा बता दे।।
शास्त्र-वेद और गुरु के वचन पर पूर्ण विश्वास- इसका नाम श्रद्धा है। श्रद्धा माने- दृढ़ विश्वास।
जैसे physical विषय में मरीज़ कुछ नहीं जानता,वह डॉ. पर सेंट-परसेंट विश्वास,श्रद्धा करता है, ऐसे ही spiritual side में हम कुछ नहीं जानते इसलिए spiritual man रूपी doctor की बात सेंट-परसेंट मानना ही होगा। ये श्रद्धा है।

-------श्री कृपालु जी महाप्रभु।

श्री महाराज जी द्वारा-------एक बार ऐसा कर के तो देखो .........
श्री राधाकृष्ण ही तुम्हारे सर्वस्व हैं। उन्हें बिलकुल ही अपना समझो। यह न सोचो कि वे तो पराप्त सर्वशक्तिमान भगवान् आदि हैं।
वे सदा अपने दोनों हाथों को पसारे हुये तुम्हारे लिये खड़े हैं। केवल तुम एक बार समस्त सांसारिक विषयों से मुँह मोड़ कर उनकी ओर निहार दो। बस, फिर वे तुम्हारे एवं तुम उनके हो जाओगे। वे तो अकारणकरुण हैं, कुछ साधना आदि की भी अपेक्षा नहीं रखते। उनका तो स्वभाव ही है अकारण कृपा करने का। तुम विश्वास कर लो, बस,काम बन जाय। तुम अपने आप को सदा के लिये उनके हाथों बेच दो, वे , सब ठीक कर लेंगे। देखो उन्होंने महान से महान पापियों को भी हृदय से लगाया है , फिर तुम्हें क्यों अविश्वास या संकोच है। एक बार ऐसा करके तो देखो।

..........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु ।

भगवान् योग माया के पर्दे में रहते हैं और जीव माया के पर्दे में , अतः भगवान् के साकार रूप में सामने खड़े होने पर हम उन्हें अपनी भावना के अनुसार ही देख पाते हैं।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Thursday, April 17, 2014

श्री महाराज जी अपने सम्पूर्ण साहित्य एवं प्रवचन द्वारा पुनः पुनः यही सिद्धान्त जीवों के मस्तिष्क में भर रहे हैं। उनके मतानुसार ब्रहम जीव माया तीन तत्व सनातन हैं , किन्तु जीव एवं माया दोनों ही ब्रहम की शक्ति हैं। ब्रहम श्री राधाकृष्ण का दिव्य प्रेम प्राप्त करना साध्य एवं उनकी ही निष्काम भक्ति करना ही साधना है।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...