Saturday, April 19, 2014

भगवान् योग माया के पर्दे में रहते हैं और जीव माया के पर्दे में , अतः भगवान् के साकार रूप में सामने खड़े होने पर हम उन्हें अपनी भावना के अनुसार ही देख पाते हैं।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Thursday, April 17, 2014

श्री महाराज जी अपने सम्पूर्ण साहित्य एवं प्रवचन द्वारा पुनः पुनः यही सिद्धान्त जीवों के मस्तिष्क में भर रहे हैं। उनके मतानुसार ब्रहम जीव माया तीन तत्व सनातन हैं , किन्तु जीव एवं माया दोनों ही ब्रहम की शक्ति हैं। ब्रहम श्री राधाकृष्ण का दिव्य प्रेम प्राप्त करना साध्य एवं उनकी ही निष्काम भक्ति करना ही साधना है।

प्रेम को परखना तो बड़ी मेहनत का काम है, लेकिन फिर भी असंभव नहीं अगर कोई स्वार्थ रहित हो जाये तो। जब कि असंभव है वह भी। लेकिन ईश्वरीय प्यार में तो अकल लगाने की जरूरत ही नहीं है कि उनका हमसे कितना प्यार है। जितनी मात्रा में हमारा है उतनी मात्रा में उनको हमसे है यह सिद्ध है।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

We put in a lot of time and energy in pursuing prosperity, fame, prestige, family etc. If we devoted even a fraction of that time in pursuing God, we would attain Him.
........SHRI MAHARAJJI.

मैं सीधा-सादा मिज़ाज था.....मुझे मोहब्बत की क्या ख़बर.......!
तेरे इक 'तबस्सुम-ए-शोख़' ने मेरे दिल को बदल दिया........!!
राधे-राधे।

हौं ऐसों हौं पतित जो पतित न आपुहिं मान ।
ऐसे पतित विचित्र को पावन करू तब जान ॥

हे ! करुणा सागर, दीनबंधु, पतितपावन, तुम्हारी कृपा के बिना कोई तुम्हारी सेवा भी तो नहीं कर सकता । हमारी गति, मति, रति सर्वस्व तुम्ही हो । अकिंचन के धन, निर्बल के बल, अशरण-शरण, कहाँ से लाएँ तुम्हें प्रसन्न करने के लिए सतत रुदन और करुण क्रंदन । अनंत जन्मो का विषयानंदी मन संसार के लिए आँसू बहाना चाहता है, श्याम मिलन के लिए नहीं । अकारण-करुण कुछ ऐसी कृपा कर दो की मन निरन्तर युगल चरणों का स्मरण करते हुए ब्रजरस धन का लोभी बन जाये । रोम रोम प्रियतम के दर्शन के लिए, स्पर्श के लिए, मधुर मिलन के लिए, इतना व्याकुल हो जाए की आंसुओं की झड़ी लग जाए ओर हम आँसुओ की माला पहनकर तुम्हें प्रसन्न कर सकें पश्चात निशिदिन श्यामा श्याम मिलन हित आँसू बहाते रहें । अपने अकारण करुण विरद की रक्षा करते हुए हे ! कृपालु, हे ! दयालु, हमारा सर्वस्व बरबस लेकर ब्रजरस प्रदान करो । किसी भी प्रकार यह स्वप्न साकार करो की हम तुम्हारे वास्तविक गौर-श्याम मिलित स्वरूप को हृदय मे सदा सदा के लिए धारण करके प्रेम रस सागर मे निमग्न हो अश्रु पूरित नेत्रों से तुम्हारी विरुदावली का अनंत काल तक गान करते रहें ।
-------जगद्गुरुत्तम भक्तियोगरसावतार कृपालु महाप्रभु ।

यह मन अनादि काल से माया के आधीन है। अतः अत्यंत मलिन हो गया है। अतः श्याम प्रेम के अश्रुजल से धोकर इसे निर्मल बना दो।
------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...