Sunday, April 20, 2014

भगवान तुमकों नहीं भूलते। वो तुम्हारे हृदय में बैठे हैं, सदा सर्वत्र। वो तुम्हारा साथ नहीं छोड़ते कभी भी। तुम ही भूले हुए हो अपने वास्तविक संबंधी को। भगवान कहते हैं:- बस मेरा स्मरण करो, और कुछ न करो। मैं सबकुछ करूँगा तुम्हारा। तुम खाली स्मरण करो, बाकी सब काम में करूँगा, और सदा के लिए अपना बना लूँगा।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

भक्त उसे कहते हैं जो हर पल हरि-गुरु को याद करता है, और हरि-गुरु भी हर पल उसे याद करते हैं।
-----श्री महाराज जी।

बड़ी सीधी सी बात है...भगवान को जानना होगा, पाना होगा... और कोई गति नहीं और कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है ।
.......श्री महाराज जी।

Love does not develop in a heart, which is impure. The heart has to be purified by sadhana. The best sadhana is weeping in separation. The tears that flow in remembrance of Radha and Krishna wash away all sins and offences (aparadhas), and the fire of separation that burns in the heart consumes the wild growth of all sorts of worldly desires.
.......SHRI MAHARAJ JI.

Saturday, April 19, 2014

Devotion must be practiced under the guidance of a GURU. Guru must possess THEORETICAL KNOWLEDGE OF SCRIPTURES and PRACTICAL EXPERIENCE OF GOD. One must look for the following in a Guru:
He must clearly answer the questions you have about God and the path leading to God.
He must remove all the doubts you have regarding God.
The Sadhana prescribed by him must bring about internal changes.
Guru is Divinity in human form. One must trust the Guru to lead him to God.

बिना हरि के भक्ति सम्भव है किन्तु बिना गुरु कृपा के भक्ति तत्व को नहीं जाना जा सकता है। अतएव भक्ति में गुरु तत्व ही प्रधान है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जो मेरी ही शरण में आ जाता है उसके अनन्त जन्म के पाप को नाश कर देता हूँ ! तो फिर पाप पाप की बात क्यों खोपड़ी में लगी है तेरे ? मैं पूर्ण शरणागत के थोड़े से पापों को नहीं , 'सर्वपापेभ्यो ' समस्त पापों को नष्ट कर देता हूँ और आगे पाप न करेगा ये ठेका ले लेता हूँ ! गारण्टी ! लेकिन प्रपन्न होना होगा ! प्रपन्न माने पूर्ण शरणागति यानी मन बुद्धि भी शरणागत हो ! अपनी बुद्धि न लगा ! मन भी मुझे दे दे !
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...