Wednesday, April 23, 2014

संसार के लोगों को एक बहुत बड़ी भ्रान्ति है। वो यह कि लोग हमारे अनुकूल हैं, हमसे प्रेम करते हैं। लेकिन मैं चैलेंज के साथ कह सकता हूँ की विश्व की एक भी स्त्री अपने पति के सुख के लिए उससे प्यार नहीं कर सकती। विश्व का कोई भी पति अपनी स्त्री के लिए प्यार नहीं कर सकता। भावार्थ यह की जब स्त्री पति ही एक दूसरे के लिए प्यार नहीं करते तो और लोग क्या करेंगे। सब एक दूसरे को धोखा दे रहे हैं,और ये नहीं समझते कि जैसे हम इसको धोखे में रखे हैं,ऐसे ही सामने वाला भी हमसे धोखा कर रहा है।
आप लोग कहेंगे की हमारी स्त्री तो हमसे बड़ा प्यार करती है। बस यही तो धोखा है आप लोगों को,जब तक जीव अपना वास्तविक आनंद प्राप्त न कर लेगा, यह असंभव है कि कोई किसी के सुख के लिए लिए कुछ करे।अरे करना तो दूर सोच तक नहीं सकता,संसार का सब प्यार स्वार्थ आधारित है। स्वार्थ कम,प्यार कम,स्वार्थ अधिक प्यार अधिक,और स्वार्थ हानि ज्यादा हो तो गोली मार देता है बेटा माँ को,स्त्री पति को........!

.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के श्रीमुख से:
क्रोध आया कि सर्वनाश हुआ। बदतमीज़ कहने पर 'बदतमीज़' बन गए। आप इतने मूर्ख हैं कि एक मूर्ख ने 'मूर्ख' कह कर आपको मूर्ख बना दिया।

अनंत जन्मों तक माथा पच्ची करने के पश्चात भी जो दिव्य ज्ञान हमें न मिलता वह हमारे गुरु(जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज) ने इतने सरल और सहज रूप में हमें प्रदान कर दिया, अब इसके बाद हमारी ड्यूटि है कि उस तत्त्वज्ञान को बार-बार चिंतन द्वारा पक्का करके उसके अनुसार प्रैक्टिकल करें। अब हमने यहाँ लापरवाही की, एक ने कुछ परवाह की, एक ने और परवाह की, एक ने पूर्ण परवाह की, पूर्ण शरणागत हो गया, अब महापुरुष ने तो अकारण कृपा सबके ऊपर की, सबको समझाया। लेकिन उसमें एक घोर संसारी ही रहा, एक थोड़ा बहुत आगे बढ़ा, एक कुछ ज्यादा आगे बढ़ा, एक सब कुछ त्याग करके 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति पर। पर जो 24 घंटे लग गया लक्ष्य प्राप्ति हेतु क्या उसके ऊपर विशेष कृपा हुई, यह सोचना मूर्खता है। कृपा तो सब पर बराबर हुई लेकिन तपे लोहे पर पानी पड़ा छन्न, जल गया और कमल के पत्ते पर पड़ा तो मोती की तरह चमकने लगा और वही पानी अगर सीप में पड़ा स्वाति का तो मोती बन गया। पानी तो सब पर बराबर पड़ रहा है लेकिन जैसा पात्र है, जैसा मूल्य समझा जितना विश्वास किया जितना वैराग्य है जिसको उसका बर्तन उतना बना, उसके हिसाब से उसने उतना लाभ उठाया। तो महापुरुष की यह कृपा है तत्त्वज्ञान करवा देना। क्योंकि बिना तत्त्वज्ञान के हम साधना भी क्या करते, भगवदप्राप्ति का तो प्रश्न ही नहीं है। तर्क, कुतर्क, संशय ही करते रहते, इसी में पूरा जीवन बीत जाता, मानव देह व्यर्थ हो जाता। साधना करते भी तो अपने अल्पज्ञान या गलत ज्ञान के अनुसार ही करते जिससे कोई लाभ नहीं होता।
.......जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु।

Tuesday, April 22, 2014

When we learn to surrender to the will of God, and accept ourselves as His servants, life becomes a festival and a continuous celebration.
........SHRI MAHARAJJI.

चाहूँ भी तो तुझसे अब खफा नहीं हुआ जाता.......!
जिन्दगी थोड़ी सी है और तेरे संग जीना है बहुत..........!!
राधे-राधे।

कुछ समय का नियम बनाकर प्रतिदिन श्यामसुंदर का स्मरण करते हुए रोकर उनके नाम-लीला-गुण आदि का संकीर्तन एवं स्मरण करो एवं शेष समय में संसार का आवश्यक कार्य करते हुए बार-बार यह महसूस करो कि श्यामसुंदर हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहें हैं, और उन्हें आप दिखा-दिखा कर कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार कर्म भी न्यायपूर्ण होगा एवं थकावट भी न होगी। एक बार करके देखिये।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मानवदेह देव दुर्लभ है। अत: अमूल्य है। इसी देह में साधना हो सकती है। अत: उधार नहीं करना है। तत्काल साधना में जुट जाना है। निराशा को पास नहीं फटकने देना है। मन को सद्गुरु एवं शास्त्रों के आदेशानुसार ही चलाना है। अभ्यास एवं वैराग्य ही एकमात्र उपाय है। सदा यही विश्वास बढ़ाना है कि वे अवश्य मिलेंगे। उनकी सेवा अवश्य मिलेंगी।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...