In
Kaliyug, the only recommended spiritual Sadhana is the chanting of
Krishna’s names, attributes and pastimes. The action which bears fruit
in twelve years in Satyug bears fruit in just one year in the Age of
Treta. In Dvapar, the same action bears fruit in just one month. And in
Kaliyug, the same action bears fruit in 24 hours.
This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Saturday, May 10, 2014
Friday, May 9, 2014
प्रेम के अधीन श्याम नाम ते न कामा।
लाला लाला कहें नित यशुमति भामा।।
prem ke adhin shyam naam te n kama.
lala lala kahen nit yashumati bhama.
लाला लाला कहें नित यशुमति भामा।।
prem ke adhin shyam naam te n kama.
lala lala kahen nit yashumati bhama.
Shyamsundar is bound only by love. It is not necessary that He should
be addressed by a specific name.Mother Yashoda used to call Him, by the
endearing name,'Lala.'
Shyama Shyam Geet - 11
-Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
Radha Govind Samiti.
Shyama Shyam Geet - 11
-Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
Radha Govind Samiti.
आजु सखि ! ह्वै गयो नैना चार |
हौं दधि बेचन जाति वृंदावन, देख्यों नंदकुमार |
सो छवि लखत बनत, नहिं वरनत, रूप – माधुरी – सार |
तन – मन – प्रान निछावरि करि मैं, लियो मोल रिझवार |
पुनि – पुनि कह्यो ‘हमारी प्यारी’ सुनि – सुनि गइ बलिहार |
कत ‘कृपालु’ बलि जात नंद को, कै गयो बंटाढार ||
हौं दधि बेचन जाति वृंदावन, देख्यों नंदकुमार |
सो छवि लखत बनत, नहिं वरनत, रूप – माधुरी – सार |
तन – मन – प्रान निछावरि करि मैं, लियो मोल रिझवार |
पुनि – पुनि कह्यो ‘हमारी प्यारी’ सुनि – सुनि गइ बलिहार |
कत ‘कृपालु’ बलि जात नंद को, कै गयो बंटाढार ||
भावार्थ – ( एक गोपी का प्रियतम श्यामसुन्दर से प्रथम मिलन एवं उसकी
अपनी सहेली से बातचीत |) अरी सखी ! आज में वृन्दावन की ओर दही बेचने जा रही
थी | अचानक ही मार्ग में प्यारे श्यामसुन्दर दिखाई पड़े और उनकी आँखों से
हमारी आँखें चार हो गईं | अरी सखी ! वह रूप – माधुरी देखते ही बनती थी,
वर्णन करने में नहीं आ सकती | मानो सौन्दर्य की मधुरता का सार निकालकर वह
छवि बनी हुई हो | मैं भी उस छवि पर अपना तन, मन, प्राण सर्वस्व न्यौछावर
करके सदा के लिए उनकी बन गई | उसने बार – बार मुझसे ‘हमारी प्यारी’, ऐसा
कहा | मैं इस शब्द को सुनकर प्रेम में विभोर हो गई | ‘श्री कृपालु जी’ कहते
हैं कि अरी सखी ! तू नाहक ही इतने अधिक आनन्द में मग्न हो रही है, उस
छलिया नन्दकुमार ने तो तेरा लोक – परलोक सभी चौपट कर दिया, क्योंकि अब तू
सदा ही उसके मधुर – मिलन के लिए तड़पा करेगी |
( प्रेम रस मदिरा मिलन - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
( प्रेम रस मदिरा मिलन - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
Thursday, May 8, 2014
यह मौन काल ली, का लली ?|
अति उदास नहिं भूख प्यास कछु, योगिनि की गति का चली ?|
चितवनि, हँसनि, गवनि सब भूली, कोउ छलिया तोहिं का छली ?|
झर झर झर दृग झर जनु निर्झर, विरहागिनि महँ का जली ?|
यह काली करतूति लगति मोहिं, जाके काली कामली |
मोहिं ‘कृपालु’ क्यों नाहिं बतावति, हमहुँ सगी नहिं का अली ||
अति उदास नहिं भूख प्यास कछु, योगिनि की गति का चली ?|
चितवनि, हँसनि, गवनि सब भूली, कोउ छलिया तोहिं का छली ?|
झर झर झर दृग झर जनु निर्झर, विरहागिनि महँ का जली ?|
यह काली करतूति लगति मोहिं, जाके काली कामली |
मोहिं ‘कृपालु’ क्यों नाहिं बतावति, हमहुँ सगी नहिं का अली ||
भावार्थ – विरहिणी किशोरी जी से एक अन्तरंग सखी कहती है कि हे किशोरी
जी ! क्या तुमने कल से मौन धारण कर लिया है ? तुम अत्यन्त उदास रहती हो,
तुमने खाना – पीना भी छोड़ दिया है | क्या योगाभ्यास कर रही हो ? तुम्हारा
देखना, हँसना, चलना सब छूट सा गया है | क्या तुम्हें किसी ठग ने ठग लिया है
? तुम्हारी आँखों से झरने की तरह दिन – रात आँसू निकला करते हैं | क्या
तुम्हारे हृदय में विरह की आग लग गयी है ? मुझे तो काली कमली वाले
श्यामसुन्दर की ही यह करामात दिखती है | ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में
सखी कहती है कि अरी सखी ! तू मुझसे इस रहस्य को क्यों छिपाती है | क्या मैं
तुम्हारी सगी नहीं हूँ ?
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
श्री महाराज के श्री मुख से ----भगवान् कहते हैं -
अन्त समय में जो मुझको स्मरण करता है। मुझको ही स्मरण करते हुये शरीर छोड़ता है। दोनों शब्दों पर ध्यान दो। ' मां एव ' केवल मुझको स्मरण करे मरते समय , केवल मुझको। ' भी ' नहीं। तो -
वो मेरे लोक को आता है।
स्मरण करना होगा , मन से।
राम श्याम , ओम कोई भगवन्नाम लो साथ में मेरा स्मरण करो। तब मुझको प्राप्त करोगे। खाली नाम से नहीं। यानी तुम्हारी भावना होनी चाहिये इस नाम मैं भगवान् बैठे हैं।
अन्त समय में जो मुझको स्मरण करता है। मुझको ही स्मरण करते हुये शरीर छोड़ता है। दोनों शब्दों पर ध्यान दो। ' मां एव ' केवल मुझको स्मरण करे मरते समय , केवल मुझको। ' भी ' नहीं। तो -
वो मेरे लोक को आता है।
स्मरण करना होगा , मन से।
राम श्याम , ओम कोई भगवन्नाम लो साथ में मेरा स्मरण करो। तब मुझको प्राप्त करोगे। खाली नाम से नहीं। यानी तुम्हारी भावना होनी चाहिये इस नाम मैं भगवान् बैठे हैं।
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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