Sunday, May 11, 2014

वेद से लेकर रामायण तक अनन्त कोटि कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान् एक ही हैं , अतः गुरु - सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

धरो मन गौर चरण को ध्यान।
जिन चरनन को अपने हिय में धारत सुन्दर श्याम।।

जो भी आये जाये वह गोविंद राधे।
मायाधीन मायातीत सब ही बता दे।।

-----श्री महाराज जी।

कोई तो बरसात ऐसी हो जो तेरे संग बरसे.......!
तन्हा तो मेरी आँखे हर रोज बरसती हैं......!!

Saturday, May 10, 2014

सखी ! इन कानन का न करी |
प्रथम मुरलिधर मुरलि तान ते, कानन कान भरी |
पुनि कानन ने कान भरे इन, नैनन घरी घरी |
तब इन नैनन हरि नैनन ते, इक दिन जाय लरी |
गयो हार अब इन नैनन, उन, नैनन बान परी |
लगतहिं बान ‘कृपालु’ अवनि गिरि, सुधि भूली सिगरी ||

भावार्थ – एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी ! मेरे इन कानों ने क्या नहीं किया | सर्वप्रथम मुरलीधर ने अपनी मधुर मुरली की तान से इन कानों के कान भरे | पुन: इन कानों ने आँखों को बहकाया | एक दिन यह आँखें जाकर श्यामसुन्दर से लड़ गयीं | परिणाम यह हुआ कि श्यामसुन्दर के नैनों के बाणों से मैं घायल हो गयी | अब इन्हें संसार की बिल्कुल भी सुधि नहीं है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि उन्हीं के कारण अब हमारे प्राणों पर भी बीती है | हे श्यामसुन्दर ! अब मुझे किसी प्रकार बचा लो |
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

जानकी नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

भगवान का नाम,रूप,लीला,गुण,धाम एवं उनके भक्त सब एक ही हैं,इनमे कहीं भी मन का अनुराग अनन्यता ही है।
.......श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...