Thursday, June 12, 2014

भगवान् से कोई जीव किसी प्रकार का लाभ नहीं उठा सकता। जैसे समुद्र का खारा जल किसी प्राणी की प्यास नहीं बुझाता परन्तु वही समुद्र का जल जब बादल बरसाता है तो सम्पूर्ण जगत तृप्त हो जाता है। इसी प्रकार संतों द्वारा ही भगवान् की दिव्य महिमा का ज्ञान प्राप्त करके जीव भगवान् का आनन्द प्राप्त कर लेता है।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

Hari and Guru alone are yours. O my mind! Surrender only to Them.
हरि गुरु दोइ अपना, गहू इनकेई शरणा।
.....श्री महाराज जी।

O RADHEY........!!!

COME TO ME AND BE WITH ME ALL THE TIME.

Wednesday, June 11, 2014

जो सौभाग्यशाली साधक उनके चरण कमलों को ह्रदय में धारण करते हैं ,
उनका अज्ञानांधकार सदा सदा को समाप्त हो जाता है।
सहज वैराग्य उत्पन्न होता है एवं दिव्य प्रेम का अंकुर प्रस्फुटित हो जाता है।
ऐसे प्रेम उदधि गुरूवर को कोटि कोटि प्रणाम।

हमेशा यह सोचते रहो कि तुम्हारी की गयी साधना सुरक्षित भी होती जा रही है,या तुम्हारे द्वारा किए कार्यों से नष्ट भी होती जा रही है।रात्रि मेँ एक बार अवश्य सोचो।
रात्रि मेँ सोते समय गुरु को अपने अंत:करण मेँ प्रवेश करके सोओ।

-----श्री महाराज जी।

अगर कोई हमको बुरा-भला भी कहता है तो सोचो कि उसने कौन सी नयी बात या गलत बात कह दी। भगवदप्राप्ति के पहले हममें सब अवगुण ही तो भरे पड़े हैं। फिर फ़ैक्ट को मानने में हमें बुरा क्यों लग रहा है।
------श्री महाराज जी।

जब भी आप लोगो को कोई भी फ़्री टाइम(free time ) मिले तो उसमे 'राधे' नाम का जप करें। चाहे घर से ऑफिस तक ही क्यूँ न जा रहे हो।मानव देह क्षण भंगुर है,इसलिए क्षण-क्षण का सदुपयोग करो।
........श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...