Tuesday, June 17, 2014

Service (seva) (physical or monetary) (tan se ya dhan se) is a token of your love and dedication at your master's feet which he accepts out of his kindness.If a rasik saint accepts your services,it is only his grace upon you.
------JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

Monday, June 16, 2014

अनंत जन्मों से हम गंदगी खा रहे हैं,विष पीने का इतना अधिक अभ्यास हो गया है कि अमृत पीना अच्छा नहीं लगता।
........श्री 'कृपालु' गुरुवर।

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के अनुसार समस्त वेदों शास्त्रों का सार 'राधा नाम' ही है। श्री राधाकृष्ण नाम, रूप, लीला, गुण, धाम का निरंतर गुणगान ही उनकी प्रमुख शिक्षा है जो वे सभी साधकों को बताते हैं।

सभी जीव पुत्र हैं गोविन्द राधे।
पुत्र धर्म नित सेवा पिता की बता दे।।
......श्री महाराजजी।

श्री महाराज जी हमारे पिता ही नहीं वरन परमपिता हैं।
इसलिए हम सभी साधकों की तरफ से.………'HAPPY FATHER'S DAY MAHARAJ JI'….....
और हम सब पर अपना दिव्य प्रेम बरसाइये और हमें अनन्य भक्ति और निष्काम सेवा का नित्य निरंतर अवसर दीजियेगा………
राधे - राधे।

प्रथम नमन गुरुवर पुनि गिरिधर, जोई श्री गुरुवर सोई श्री गिरिधर।
हरि गुरु कृपा सदा सब ही पर, अंत:करण पात्र पावन कर।
करहु 'कृपालु' कृपा मोहूँ पर, तन मन धन अर्पन चरनन पर।।

Sunday, June 15, 2014

Going to temple or Satsang and simultaneously not making efforts to remove the material attachment is sheer hypocrisy. By doing this, we are not deceiving Hari and Guru (as they know everything), but we actually cheat ourselves and plunge into the ocean of karmic bondage for long time... So let's be sincere in Sadhna Bhakti.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...