Wednesday, June 18, 2014

सारा संसार मायाजनित अज्ञान के द्वारा अन्धा हो रहा है परन्तु अपने को कोई भी अज्ञानी नहीं समझता सभी ज्ञानी समझते हैं।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Tuesday, June 17, 2014

एक वाक्य रट लीजिये रोम-रोम से कि श्यामसुंदर के सुख के लिये ही श्यामसुंदर का दर्शन चाहेंगे,सेवा चाहेंगे,सब चीज उनकी इच्छा के अनुसार,उनकी इच्छा के विपरीत कदापि नहीं।
........श्री महाराज जी।

एक साधक का प्रश्न --- किसी साधक का ये सोचना कि श्री महाराज जी दुःखी हैं , क्या इस प्रकार का चिंतन गलत है ?
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर ---- गलत तो नहीं है। सब कुछ ठीक है। किन्तु क्यों दुःखी है , उसका कारण सोचे, भविष्य में उसको दूर करने का प्रयत्न करे।
यदि वह ऐसा नहीं करता है तो वह सोचेगा --- हम तो महाराज जी को सुखी कर ही नहीं सकते और यह नामापराध कर डालेगा।

जीव न मरता है न पैदा होता है।
ये जीव न मरता है न पैदा होता है। तो रमेश न तो बना है और न मरा है। वो आया था ओ चला गया ऐसा बोलो। जैसे हम संसार से बोलते हैं न अरे वो रमेश बम्बई से आज आया था एक घण्टे बाद चला गया। तो, इसका मतलब मरा तो नहीं। नहीं नहीं। आया था बम्बई से एक घण्टे बाद चला गया। ऐसे ही ये जीव माँ के पेट में शरीर में अाया था और आज इस शरीर को छोड़कर चला गया। तो जीव भी नित्य है , भगवान भी नित्य हा और माया जड़ होते हुये भी नित्य है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

हम आनंद रुपी भगवान् के अंश हैं।
तो ये सब बेचारे भिखमंगे हैं। इनके पास प्रेम नहीं है ये स्वार्थ के लिये प्रेम करते हैं। और जहाँ स्वार्थ है , वहॉँ का। प्रेम प्रेम है ही नहीं। क्योंकि स्वार्थ काम सिद्ध हुआ तो प्रेम घट गया। स्वार्थ बिलकुल नहीं सिद्ध हो रहा है प्रेम खतम हो जाता है। उसकी आधारशिला गलत है इसलिये वो प्रेम टिकाउ कैसे रहेगा।
चाहे माँ का प्रेम हो , चाहे बाप का , चाहे बीबी का , चाहे किसी वस्तु का हो। तो सबसे प्रिय वस्तु आत्मा है। आत्मा से वैराग्य किसी को नहीं होगा। देखने का , सुनने का , सूंघने का रस लेने का सामान क्यों चाहते हो। केवल एक कारण है , आत्मा को सुख मिलता है। तो आत्मा का सुख क्यों चाहते हो ?
उसका कोई कारण नहीं जानते हम कि हम आत्मा का सुख क्यों चाहते हैं।
दूसरे का सुख क्यों नहीं चाहते अपनी आत्मा का सुख क्यों चाहते है ? इसलिये चाहते हैं कि हम आनन्द रुपी भगवान् के अंश हैं।

-------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु।

Service (seva) (physical or monetary) (tan se ya dhan se) is a token of your love and dedication at your master's feet which he accepts out of his kindness.If a rasik saint accepts your services,it is only his grace upon you.
------JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

Monday, June 16, 2014

अनंत जन्मों से हम गंदगी खा रहे हैं,विष पीने का इतना अधिक अभ्यास हो गया है कि अमृत पीना अच्छा नहीं लगता।
........श्री 'कृपालु' गुरुवर।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...