This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Wednesday, June 18, 2014
Tuesday, June 17, 2014
एक साधक का प्रश्न --- किसी साधक का ये सोचना कि श्री महाराज जी दुःखी हैं , क्या इस प्रकार का चिंतन गलत है ?
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर ---- गलत तो नहीं है। सब कुछ ठीक है। किन्तु क्यों दुःखी है , उसका कारण सोचे, भविष्य में उसको दूर करने का प्रयत्न करे।
यदि वह ऐसा नहीं करता है तो वह सोचेगा --- हम तो महाराज जी को सुखी कर ही नहीं सकते और यह नामापराध कर डालेगा।
श्री महाराज जी द्वारा उत्तर ---- गलत तो नहीं है। सब कुछ ठीक है। किन्तु क्यों दुःखी है , उसका कारण सोचे, भविष्य में उसको दूर करने का प्रयत्न करे।
यदि वह ऐसा नहीं करता है तो वह सोचेगा --- हम तो महाराज जी को सुखी कर ही नहीं सकते और यह नामापराध कर डालेगा।
जीव न मरता है न पैदा होता है।
ये जीव न मरता है न पैदा होता है। तो रमेश न तो बना है और न मरा है। वो आया था ओ चला गया ऐसा बोलो। जैसे हम संसार से बोलते हैं न अरे वो रमेश बम्बई से आज आया था एक घण्टे बाद चला गया। तो, इसका मतलब मरा तो नहीं। नहीं नहीं। आया था बम्बई से एक घण्टे बाद चला गया। ऐसे ही ये जीव माँ के पेट में शरीर में अाया था और आज इस शरीर को छोड़कर चला गया। तो जीव भी नित्य है , भगवान भी नित्य हा और माया जड़ होते हुये भी नित्य है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
ये जीव न मरता है न पैदा होता है। तो रमेश न तो बना है और न मरा है। वो आया था ओ चला गया ऐसा बोलो। जैसे हम संसार से बोलते हैं न अरे वो रमेश बम्बई से आज आया था एक घण्टे बाद चला गया। तो, इसका मतलब मरा तो नहीं। नहीं नहीं। आया था बम्बई से एक घण्टे बाद चला गया। ऐसे ही ये जीव माँ के पेट में शरीर में अाया था और आज इस शरीर को छोड़कर चला गया। तो जीव भी नित्य है , भगवान भी नित्य हा और माया जड़ होते हुये भी नित्य है।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।
हम आनंद रुपी भगवान् के अंश हैं।
तो ये सब बेचारे भिखमंगे हैं। इनके पास प्रेम नहीं है ये स्वार्थ के लिये प्रेम करते हैं। और जहाँ स्वार्थ है , वहॉँ का। प्रेम प्रेम है ही नहीं। क्योंकि स्वार्थ काम सिद्ध हुआ तो प्रेम घट गया। स्वार्थ बिलकुल नहीं सिद्ध हो रहा है प्रेम खतम हो जाता है। उसकी आधारशिला गलत है इसलिये वो प्रेम टिकाउ कैसे रहेगा।
चाहे माँ का प्रेम हो , चाहे बाप का , चाहे बीबी का , चाहे किसी वस्तु का हो। तो सबसे प्रिय वस्तु आत्मा है। आत्मा से वैराग्य किसी को नहीं होगा। देखने का , सुनने का , सूंघने का रस लेने का सामान क्यों चाहते हो। केवल एक कारण है , आत्मा को सुख मिलता है। तो आत्मा का सुख क्यों चाहते हो ?
उसका कोई कारण नहीं जानते हम कि हम आत्मा का सुख क्यों चाहते हैं।
दूसरे का सुख क्यों नहीं चाहते अपनी आत्मा का सुख क्यों चाहते है ? इसलिये चाहते हैं कि हम आनन्द रुपी भगवान् के अंश हैं।
तो ये सब बेचारे भिखमंगे हैं। इनके पास प्रेम नहीं है ये स्वार्थ के लिये प्रेम करते हैं। और जहाँ स्वार्थ है , वहॉँ का। प्रेम प्रेम है ही नहीं। क्योंकि स्वार्थ काम सिद्ध हुआ तो प्रेम घट गया। स्वार्थ बिलकुल नहीं सिद्ध हो रहा है प्रेम खतम हो जाता है। उसकी आधारशिला गलत है इसलिये वो प्रेम टिकाउ कैसे रहेगा।
चाहे माँ का प्रेम हो , चाहे बाप का , चाहे बीबी का , चाहे किसी वस्तु का हो। तो सबसे प्रिय वस्तु आत्मा है। आत्मा से वैराग्य किसी को नहीं होगा। देखने का , सुनने का , सूंघने का रस लेने का सामान क्यों चाहते हो। केवल एक कारण है , आत्मा को सुख मिलता है। तो आत्मा का सुख क्यों चाहते हो ?
उसका कोई कारण नहीं जानते हम कि हम आत्मा का सुख क्यों चाहते हैं।
दूसरे का सुख क्यों नहीं चाहते अपनी आत्मा का सुख क्यों चाहते है ? इसलिये चाहते हैं कि हम आनन्द रुपी भगवान् के अंश हैं।
-------जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु।
Subscribe to:
Posts (Atom)
मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
-
Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
-
गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
-
ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






