Thursday, June 19, 2014

स्मरण एक मिनिट तो क्या एक क्षण से शुरू होता है। इसे बढ़ाना ही 'साधना' है। इस एक क्षण के 'स्मरण' को 'मरण' तक बढ़ाते ही रहना है।
..........श्री महाराज जी।

मानव देह की क्षणभंगुरता पर विचार करते हुए तुरंत वास्तविक महापुरुष द्वारा निर्दिष्ट साधना प्रारम्भ करो, संसारी कमाई पर नहीं, ईश्वरीय कमाई पर ध्यान दो। वो ही साथ जायेगी।
.......श्री महाराज जी।

गुरु आवश्यक है , गुरु किसे कहते हैं ?
जिसमें श्रीकृष्ण प्रेम हो , केवल लैक्चर दे , उससे काम नहीं चलेगा। भगवान् की प्राप्ति में केवल प्रेम देखा जायेगा।
रामही केवल प्रेम पियारा।
आप लोग जब पैदा हुये तो बोल नहीं सकते थे , माँ को पहचान भी नहीं सकते थे। भूख लगी - रो दिये। दर्द हुआ - रो दिये। बस ! बस वहीँ फिर पहुँचना होगा आपको एक दिन। इस जन्म में पहुँचो चाहें हजारों जन्मों में दुःख भोगने के पश्चात्। ये कृपालु का वाक्य आपको सदा याद रखना है - फिर भोले बालक बनना है , { भोला बालक }
गुरु के आदेश में जरा भी बुद्धि न लगाओ ; जैसे वाल्मीकि मरा - मरा कहता रहा , उसने न तो ये पूछा कि मरा - मरा कहने से क्या होगा ? और न ये पूछा आप कब लौटकर आयेंगे ? जो आज्ञा है उसका पालन करना है।

............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

जो मेरी ही शरण में आ जाता है उसके अनन्त जन्म के पाप को नाश कर देता हूँ। तो फिर पाप पाप की बात क्यों खोपड़ी में लगी है तेरे ? मैं पूर्ण शरणागत के थोड़े से पापों को नहीं , 'सर्वपापेभ्यो ' समस्त पापों को नष्ट कर देता हूँ और आगे पाप न करेगा ये ठेका ले लेता हूँ। गारण्टी। लेकिन प्रपन्न होना होगा। प्रपन्न माने पूर्ण शरणागति यानी मन बुद्धि भी शरणागत हो। अपनी बुद्धि न लगा....... मन भी मुझे दे दे।
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

Shri Radha, the bliss-imparting power (hladini shakti) of Shri Krishna, teaches the lesson of divine love. No one loves or pleases Krishna like She does. Supremely selfless in Her devotion to Him, She gives no thought to Her own happiness, but only to His. To serve Him is the aim of Her existence and to please Him, Her joy.
.......SHRI MAHARAJ JI.

Wednesday, June 18, 2014

दाद को खुजालते समय तो आराम मालूम पड़ता है पर बाद में, उस जगह असह्य जलन होने लगती है. संसार के भोग भी ऐसे ही है - शुरू शुरू में तो वे बड़े ही सुखप्रद मालूम होते है परन्तु बाद में उनका परिणाम अत्यन्त भयंकर एवं दुखमय होता है।
While itching ringworm, we feel great comfort that time but afterwards on that place we will have intolerable irritation. In the same way enjoyment of material matters of this world are like this only- Initially they are very comfy but afterwards their results are very dangerous and Sorrowful.
--------JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.

प्रारब्ध उसी को कहते हैं जब दुःख की कल्पना की जाय किन्तु सुख प्राप्त हो अथवा सुख की कल्पना की जाय और दुःख प्राप्त हो।
.......श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...