Saturday, June 21, 2014

तुम लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
****जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु ****

Preparatory devotion is repeated contemplation upon God and the Guru lovingly. Perfect devotion is constant absorption of the mind in them.
......SHRI MAHARAJ JI.

ठाकुर जी का जैसा भी चाहें , रूपध्यान बना लो। बाल्यावस्था का ,किशोर रूप का , यूवावस्था का। ठाकुर जी उसी रूप मे मिल जायेंगे। लेकिन भगवान् को पहले देखकर फिर रूपध्यान करने वाले नास्तिक बन जायेंगे , क्योंकि हमारी प्राकृत आँखे 'प्राकृत राम ' को देखेंगी ,भगवान् राम को नहीं।
"चिदानंदमय देह तुम्हारी ,विगत विकार जान अधिकारी ''
अतः अधिकारी बनने के पूर्व देखने की बात न करो।
.......श्री महाराज जी।

संत भोजपत्र के सामान निरन्तर दूसरों के लिये ही कष्ट सहते हैं। जीव कल्याण हित अपना सर्वस्व लुटा देते हैं।
-----श्री महाराज जी।

बिनु रोये किन पाइयां प्रेम पियारो मीत।

Friday, June 20, 2014

संत भोजपत्र के सामान निरन्तर दूसरों के लिये ही कष्ट सहते हैं। जीव कल्याण हित अपना सर्वस्व लुटा देते हैं।
-----श्री महाराज जी।

मेरे केवल इसी वचन पर विशवास कर लो.......
भगवान् की इतनी बड़ी कृपा है कि वे कहते हैं कि मैं सर्वव्यापक हूँ , तू इसको मानता नहीं है, मैं गोलोक में रहता हूँ, वहां तुम आ नहीं सकते, मैं तुम्हारे अंतःकरण में तुम्हारे साथ बैठा हूँ इसका तुम्हे ज्ञान नहीं है , इसलिए लो, ' मैं ' अपने नाम में अपने आप को बैठा देता हूँ। " अपने नाम में 'मैं' मूर्तिमान बैठा हुआ हूँ।"
जिस दिन यह बात तुम्हारे मन में बैठ जाएगी , तुम्हें यह दृढ विश्वास हो जाएगा कि भगवान् और भगवान् का नाम एक है। दोनों में एक जैसी शक्तियाँ हैं, एक से गुण हैं, उस दिन फिर एक नाम भी जब लोगे, एक बार भी 'राधे' कहोगे तो कहा नहीं जायेगा, वाणी रुक जाएगी, मन डूब जायेगा, कंठ गद्गद हो जायेगा, फिर भगवत्प्राप्ति में क्या देर होगी। उसी क्षण गुरुकृपा एवं भगवत्प्राप्ति हो जाएगी। मेरे केवल इसी वचन पर विश्वास कर लो, स्वर्ण अक्षरों में लिख लो।

-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु ।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...