This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Sunday, June 22, 2014
It
is evident that to use God’s grace as an excuse for spiritual inaction,
is a road leading to total ruin. The truth is that God does not impart
His grace whimsically. God’s grace is based upon some condition; that is
complete surrender. Whosoever fulfils this condition attains His grace
and becomes eternally blissful.
.......SHRI MAHARAJ JI.
.......SHRI MAHARAJ JI.
कबीर जी कहते हैं:-
तीन लोक नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय।
करता करे न करि सके,गुरु करे सो होये।।
तीन लोक नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय।
करता करे न करि सके,गुरु करे सो होये।।
यदि परमात्मा करना भी चाहे, तो भी न कर पाये। लेकिन गुरु चाहे तो हो जाये।
इस वाक्य को पढ़कर आप सोचते होंगे कि ऐसा क्या? कबीर जी ने गुरु को
परमात्मा से ऊपर बता दिया ये तो अतिशयोक्ति करते मालूम पड़ते हैं। जी नहीं,
ध्यान से विचार करें। कबीर कह रहें हैं कि मार्ग के बिना तुम मंजिल पर
पहुँच नहीं सकते। मंज़िल तो एक छोर है, उस छोर तक पहुचने के लिये मार्ग नहीं
होगा तो पहुचोंगे कैसे? यानि मार्ग के बिना मंज़िल मिल नहीं सकती तो बताओ
मार्ग बड़ा या मंज़िल? क्योंकि मार्ग पर चल दिये तो निश्चित ही एक दिन मंज़िल
पर पहुँचोगे।
यानि परमात्मा मंज़िल है तो वो कुछ करना भी चाहे तो कर नहीं सकता काम। 'गुरु रूपी' मार्ग ही है, उसी के द्वारा मंज़िल मिलेगी। बस हमें ठीक से समझना होगा।
यानि परमात्मा मंज़िल है तो वो कुछ करना भी चाहे तो कर नहीं सकता काम। 'गुरु रूपी' मार्ग ही है, उसी के द्वारा मंज़िल मिलेगी। बस हमें ठीक से समझना होगा।
सच्चा साधक ------
1- द्वेष करने वाले व्यक्ति के प्रति भी द्वेष न करें ! उदासीन रहें !
2- आज कोई नास्तिक भी है , तो कल उच्च साधक बन सकता है ! अतः साधक यह न सोचे कि इसका पतन सदा के लिए हो चुका ! सूरदास आदि संत उदाहरण हैं !
1- द्वेष करने वाले व्यक्ति के प्रति भी द्वेष न करें ! उदासीन रहें !
2- आज कोई नास्तिक भी है , तो कल उच्च साधक बन सकता है ! अतः साधक यह न सोचे कि इसका पतन सदा के लिए हो चुका ! सूरदास आदि संत उदाहरण हैं !
3 - गुरु की सेवा करने वाला तो साधक ही है , उसके प्रिय होने के कारण उससे द्वेष करना पाप है !
4 - सचमुच भी कोई अपराधी हो तो भी मन से भी उसके भूतपूर्व अपराधों को न सोचें , न बोलें !
5 - संसार में भगवत्प्राप्ति के पूर्व सभी अपराधी हैं ! बड़े - बड़े साधकों का भी पतन एवं बड़े - बड़े पापियों का भी उत्थान एक क्षण में हो सकता है !
6 - सब में श्री कृष्ण का निवास है , अतः उनको ही महसूस करें !
**********जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ***********
4 - सचमुच भी कोई अपराधी हो तो भी मन से भी उसके भूतपूर्व अपराधों को न सोचें , न बोलें !
5 - संसार में भगवत्प्राप्ति के पूर्व सभी अपराधी हैं ! बड़े - बड़े साधकों का भी पतन एवं बड़े - बड़े पापियों का भी उत्थान एक क्षण में हो सकता है !
6 - सब में श्री कृष्ण का निवास है , अतः उनको ही महसूस करें !
**********जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ***********
Saturday, June 21, 2014
तुम
लोग अपने मन को अपने शरण्य में रखो। परस्पर प्यार से रहो एवं स्वयं में
दोष देखो, अपनी-अपनी सेवा करो। यदि मुझे सुख देना चाहते हो तो, सदा अपने मन
को राग द्वेष रहित रखो एवं शरण्य से प्यार बढ़ाओ। मैं सदा तुम लोगो को याद
करता हूँ, तथा एक-एक क्षण का आइडिया नोट करता हूँ। वेद से लेकर रामायण तक
अनंत कोटि-कल्प तक अध्ययन करके देख लो यही पाओगे कि गुरु और भगवान एक ही है
अत: गुरु सेवा ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है।
****जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु ****
****जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु ****
ठाकुर
जी का जैसा भी चाहें , रूपध्यान बना लो। बाल्यावस्था का ,किशोर रूप का ,
यूवावस्था का। ठाकुर जी उसी रूप मे मिल जायेंगे। लेकिन भगवान् को पहले
देखकर फिर रूपध्यान करने वाले नास्तिक बन जायेंगे , क्योंकि हमारी प्राकृत
आँखे 'प्राकृत राम ' को देखेंगी ,भगवान् राम को नहीं।
"चिदानंदमय देह तुम्हारी ,विगत विकार जान अधिकारी ''
अतः अधिकारी बनने के पूर्व देखने की बात न करो।
"चिदानंदमय देह तुम्हारी ,विगत विकार जान अधिकारी ''
अतः अधिकारी बनने के पूर्व देखने की बात न करो।
.......श्री महाराज जी।
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






