Wednesday, July 2, 2014

हे! मेरी राधे!..... गुरु द्वारा मुझे यह ज्ञान दिया गया कि तुम ही मेरी हो परंतु मैंने कभी इस सत्य को दृढ़तापूर्वक कभी माना नहीं,अब तुम ही मनवा दो।

Tuesday, July 1, 2014

तुझ से विमुख होके गोविन्द राधे।
अति दुःख पाया हरि अब तो क्षमा दे।।

क्षण - क्षण अपना , साधना तथा सेवा में व्यतीत करो। आज का दिन गया, फिर मिले या न मिले, दुबारा मानव देह फिर मिले या न मिले। इस समय तो मानव देह भी मिला है और गुरु भी मिल गया है । फिर भी लापरवाही क्यों ? इससे अच्छा अवसर फिर आसानी से नहीं मिलने वाला, इसका महत्व बार-बार सोचो।
........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

प्रभु से प्रेम करो, प्रभु से प्रेम करो, और सिर्फ प्रभु से प्रेम करो।
वो जो आपकी आँखों से देख रहा है, वो जो आपकी देह को चला रहा है, वो जो आपके दिल में धड़क रहा है, जब धड़कना बंद कर देगा तो बाकी के सब प्रेम समाप्त हो जायेंगे। आपका घर-परिवार, धन-संपत्ति, यार-दोस्त, सगे-संबंधी यहाँ तक कि यह पृथ्वी भी किसी काम नहीं आएगी। वह कौन है जो जन्म से पूर्व आपके साथ था, और मृत्यु के पश्चात भी साथ रहेगा, जो कभी साथ नहीं छोड़ेगा। उस प्रेमियों के प्रेमी से परिचय, मित्रता और प्रेम करना ही सार्थक है।

जो भगवान के शरणागत होने का अभ्यास करता है अर्थात मन को जगत से हटाकर श्रीकृष्ण में ही सर्वदा लगाने का अभ्यास करता है, वह सतसंपर्दायवादी है। और ठीक इसके विपरीत जो मायिक जगत में सुख मानते हुए तदर्थ प्रयत्नशील है, वह माया के संपर्दाय वाला है।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

हरि-गुरु में अनन्त सामर्थ्य है, पर हमारा साथ छोड़ने की उनमे सामर्थ्य ही नहीं है। इस विषय में वे बेचारे लाचार हैं |

प्रश्न: परमार्थ के पथ पर चलने वाले साधक को क्या अपने भविष्य की चिंता करनी चाहिए ?
उत्तर: श्री महाराजजी द्वारा :- नहीं। क्योंकि जो कुछ प्रारब्ध में होगा वही उसे प्राप्त होगा । परमार्थ के पथ पर चलने वाले को चिंता किस बात की ,अगर कोई कहे की भविष्य की चिंता नहीं करेंगे तो मर जाएंगे ,यह कैसे हो सकता है ,जब भगवान के वो शरणागत है और शरणागत का योगक्षेम स्वयं भगवान वहन करते हैं।

Sunday, June 22, 2014

मन के बहकावे में न आया करो। मन ने बड़े - बड़े योगियों को बर्बाद कर दिया। अगर मन से हार मान लिया तो वह आदमी तुरन्त पागल हो सकता है, आत्महत्या भी कर सकता है।
***जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज***

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...