This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Friday, July 4, 2014
रैन – दिन विरहिनि तलफत जात |
दई !! दई !! दई !! हाय ! हाय ! कहि, पुनि पुनि अति अकुलात |
कुंज – पुंज टेरत हेरत हरि, सुंदर श्यामल गात |
तारे गिन गिन छिन छिन बितवति, कालनिशा – सम रात |
ग्रह गृहीत जिमि नाचति, गावति, हँसति रुदति बतरात |
बैरी विरह ‘कृपालु’ लगायो, प्राण लेन की घात ||
दई !! दई !! दई !! हाय ! हाय ! कहि, पुनि पुनि अति अकुलात |
कुंज – पुंज टेरत हेरत हरि, सुंदर श्यामल गात |
तारे गिन गिन छिन छिन बितवति, कालनिशा – सम रात |
ग्रह गृहीत जिमि नाचति, गावति, हँसति रुदति बतरात |
बैरी विरह ‘कृपालु’ लगायो, प्राण लेन की घात ||
भावार्थ – विरहिणी कहती है कि दिन एवं रात तड़पते हुए ही व्यतीत होती
है | मैं बार – बार विरह में व्याकुल होकर ‘हाय दई ! हाय दई !! कहकर आहें
भरा करती हूँ | प्रत्येक कुंज में अपने प्यारे श्यामसुन्दर को पुकारती हुई
ढूँढा करती हूँ | एक – एक क्षण तारे गिन – गिनकर कालनिशा के समान रात्रि
व्यतीत करती हूँ | भूत लगे हुए के समान नाचती हूँ, कभी गाती हूँ, कभी रोती
हूँ, कभी हँसती हूँ एवं कभी अपने आप ही प्रियतम से उनके वियोग में बातें
करती हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि इस विरह रूपी शत्रु ने अब मेरे
प्राण लेने की सोच ली है |
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति.
भगवान
के समस्त नाम ,समस्त गुण,समस्त लीला,समस्त धाम एवं उनके समस्त भक्त परस्पर
एक हैं। एक के प्रति दुर्भावना करना सभी के प्रति दुर्भावना करना है।
समस्त महापुरुष एवं भगवान के समस्त अवतार भी परस्पर अभिन्न हैं। ऐसा
तत्वज्ञान सदा के लिए हृदय में अंकित कर लेना चाहिए।
-----जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।
-----जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाप्रभु।
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