Sunday, July 6, 2014

मानव देह मिला, वास्तविक गुरु मिले, संसार से प्रथक हो गये, हरि-गुरु सेवा भी मिली, इतनी कृपा तो करोड़ों जीवों में से किसी एक को भी नहीं मिलती। अत: क्षण-क्षण सावधान रहो।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Service (seva) (physical or monetary) (tan se ya dhan se) is a token of your love and dedication at your master's feet which he accepts out of his kindness.If a rasik saint accepts your services,it is only his grace upon you.
------JAGADGURU SHRI KRIPALUJI MAHARAJ.

Practice to feel the presence of Shri Maharaj Ji everywhere and all the time.
RADHEY-RADHEY.

साधना में हर एक को क्रोध आता है। जब साधक यह सोचता है कि हमने तुमको महापुरुष माना और तुम कृपा कर सकते हो , फिर हम पर कृपा क्यों नहीं करते। यह स्वाभाविक प्रशन है। लेकिन सिद्धान्त यह है कि जब अधिकारी बनोगे तभी कृपा होगी। जो क्रोध दोष देखता है वह निंदनीय है। लेकिन जो पर्सनेलिटी में दोष नहीं देखता और क्रोध करता है , वह मनः कल्पित है। प्रेमा भक्ति से भाव वेश भक्ति तक क्रोध होता है वह क्रोध नहीं माना जा सकता।
-----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

प्रारब्ध उसी को कहते हैं जब दुःख की कल्पना की जाय किन्तु सुख प्राप्त हो अथवा सुख की कल्पना की जाय और दुःख प्राप्त हो।
.......श्री महाराज जी।

जिसका मन संसार के किसी पदार्थ में न हो , ऐसा व्यक्ति ही परम शान्ति का अधिकारी बन सकता है।
पुनः और भी स्पष्ट कहा है कि ---- तू जो कुछ करता है , जो कुछ खाता है , जो कुछ यज्ञादि करता है , जो कुछ दानादि करता है , सब मेरे निमित ही कर , अर्थात मन का लगाव मुझमें हो तो तेरा कर्म अकर्म हो जायेगा और तू कृतार्थ हो जायेगा।
…………श्री महाराज जी।

"आनुकूल्यस्य संकल्प: :- गुरु और भगवान के अनुकूल ही सोंचे। उनकी किसी भी बात में,किसी भी क्रिया में प्रतिकूल बुद्धि न होने पाये। वो प्यार करें, डांटे, खार करे, कोई एक्टिंग करें, उलटी भी की तो भी कभी दुर्भावना न होने पावे।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...