Wednesday, July 9, 2014

1 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिनका कोई गुरु नहीं है और वे स्वयं जगद्गुरुतम हैं।
2 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिन्होंने एक भी शिष्य नहीं बनाया किन्तु इनके लाखों अनुयायी हैं।
3 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिनके जीवन कल में ही जगद्गुरुतम उपाधि की पचासवीं वर्षगाँठ मनाई गई हो।

4 - ये पहले जगद्गुरु हैं जिन्होंने ज्ञान एवं भक्ति दोनों में सर्वोच्चता प्राप्त की व् दोनों का मुक्तहस्त से दान कर रहे हैं।
5- ये पहले जगद्गुरु हैं जो विदेशों में भी स्वयं प्रचाराथ्र गये।
6- ये पहले जगद्गुरु हैं जिन्होंने पुरे विश्व में श्री राधाकृष्ण की माधुर्य भक्ति का धुआंधार प्रचार किया एवं सुमधुर श्री राधे नाम को विश्वव्यापी बना दिया।
7- सभी महान सन्तों ने मन से ईश्वर भक्ति की बात बतायी है , जिसे , ध्यान , सुमिरन , स्मरण या मेडीटेशन आदि नामों से बताया गया है ! श्री कृपालु जी ने प्रथम बार एस ध्यान को ' रूपध्यान ' नाम देकर स्पष्ट किया कि ध्यान कि सार्थकता तभी है जब हम भगवान् के किसी मनोवांछित रूप का चयन करके उस रूप पर ही मन को टिकाये रहें ! मन को भगवान् के किसी एक रूप पर केन्द्रित करने का नाम ही ध्यान या मन से भक्ति करना है , क्योंकि भगवान् के ही एक रूप पर मन को न टिकने से , मन यत्रतत्र संसार में ही भागता रहेगा ! भगवान् को तो देखा नहीं तो फिर उनके रूप का ध्यान कैसे किया जय , उसका क्या विज्ञान है , उसका अभ्यास कैसे करना है , आदि बातों को - भक्तिरसामृत सिन्धु , नारद भक्ति सूत्र , ब्रह्मसूत्र आदि के द्वारा प्रमाणित करते हुए श्री कृपालु जी महाराज ने प्रथम बार अपने ग्रन्थ ' प्रेम रस सिद्धान्त ' में बड़े स्पष्ट रूप से समझाया है।
8- ये पहले जगद्गुरु हैं जो ९० वर्ष की आयु में भी समस्त उपनिषदों , भगवतादी पुराणों , ब्रह्मसूत्र , गीता आदि प्रमाणों के नम्बर इतनी तेज गति से बोलते हैं कि श्रोताओं को स्वीकार करना पड़ता है कि ये श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ के मूर्तिमान स्वरूप हैं।

गुरु के अनंत उपकारों के बदले सर्वस्व समर्पण करके भी कोई गुरु के ऋण से उऋण नहीं हो सकता।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

Tuesday, July 8, 2014

Both from the point of view of experiencing the highest and sweetest nectar of divine love, and because of the ease provided in the practice of devotion, meditating upon Lord Krishna is most appropriate. He is infinitely beautiful and charming being the ocean of nectarine bliss, the stealer of the hearts of surrendered souls, the Crest Jewel of the Rasiks and the Darling of Braj.
............JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.


चाहे जैसी भी परिस्थिति हो सदैव गुरु के अनुकूल ही चिन्तन करो | प्रतिकूल परिस्थिति में भी अनुकूल चिन्तन बना रहे तभी समझो कि हमारी स्थिति ठीक है | चाहे कैसी भी कठिन सेवा हो या आज्ञा हो उसके पालन में प्राणपन से बलिहार जाना चाहिए |
............श्री महाराज जी |

जैसे किसी वास्तविक महापुरुष का संग करने से अनंत जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। उसी प्रकार हरि गुरु से विमुख व्यक्ति का संग जीव से अनंत पाप करा देता है। इसीलिए हरि - गुरु से विमुख व्यक्तियों का संग नहीं करना चाहिये।
............जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु ।

गलती प्रत्येक व्यक्ति करता है,अत: सबसे नम्रता एवं दीनता का व्यवहार करो,सबको अपने से इतना बड़ा मानो कि दूसरा तुम्हारी दीनता को देख कर पानी-पानी हो जाये।
------श्री महाराज जी।

Divine love is the absolute essence of God’s personal power, swaroop shakti. The Guru bestows that divine love on the qualified soul who has completely purified his mind.
..........JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.


मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...