Saturday, August 2, 2014

O mind! It is selfish desire which drives the entire world. Take a bumblebee, which hovers around a flower humming in appreciation as long as it emits fragrance. But, when that same flower withers and falls to the ground, the bee will not even look at it, even by mistake. Similarly, one’s son, wife, friend, husband or any other worldly relation, maintains their relationship with you simply to fulfil their own selfish ends. This fact needs to be pondered over deeply.
.........JAGADGURU SHRI KRIPALU JI MAHARAJ.


HAPPY NAAG PANCHMI TO ALL DEAR FRIENDS ACROSS THE GLOBE.
RADHEY-RADHEY.

भगवत्कृपा का सबसे पक्का प्रमाण, भगवज्जन मिलन है, कृपा से लाभ लेना तभी संभव है, जब इस कृपा को बार-बार चिन्तन में लाया जाय। भगवज्जन का यदि दर्शन मात्र प्राप्त हो जाय तो बार-बार चिन्तन कर आनन्द विभोर होना चाहिए । क्योंकि उसके दर्शन को पाने या दिलाने की सामर्थ्य किसी भी साधना में नहीं है । यदि दर्शन के अतिरिक्त और भी सामीप्य मिल जाय फिर तो बात ही क्या है । यदि उस अमूल्य निधि को पाकर भी साधारण भावना या चिन्तन रहा तो महान् कृतघ्नता एवं महान् दुर्भाग्य ही होगा, क्योंकि इससे अधिक हमें क्या पाना शेष है ।
.......जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

कभी यह न सोचो कृपा की कमी है, कमी जो है वह हममें ही है | महापुरुष शरणागत के लिये क्या-क्या भगीरथ प्रयत्न करता है, यह तो भगवत्प्राप्ति होने पर ही साधक को समझ में आ सकता है | सब लोग कमरा बन्द करके सोचें तो पायेंगे कि मेरा कितना कायापलट हो गया ? मैं कहाँ जा रहा था, कहाँ से कहाँ ला कर खड़ा कर दिया महाराज जी ने ?
-----------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

क्यों रहिहैं ब्रज ब्रजनार रे |
करत लँगरई दिन प्रति दूनी, नटखट नंदकुमार रे |
घूँघट के पट टारि कहत टुक, हमरिहुँ ओर निहार रे |
जो बरजहु तो कर बरजोरी, चुनरिहुँ शीश उतार रे |
लै लकुटिहिं मटुकीहूँ फोरत, तोरत गर लर हार रे |
सब ‘कृपालु’ ब्रज नारि हारि गईं, कछु न याय उपचार रे ||

भावार्थ – एक सखी कहती है कि अब इस ब्रज में ब्रजांगनाओं का रहना असम्भव है, क्योंकि यहाँ पर नटखट श्यामसुन्दर का ऊधम दिन – प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है | वे गोपियों के घूँघट को खोलकर उनसे कहते हैं कि तनिक हमारी ओर भी तो देखो | अगर उन्हें घूँघट खोलने से कोई रोकती है तो बरबस सिर से चुनरी भी उतार देते हैं | साथ ही हाथ में लठिया लेकर पीछे से मटुकी फोड़ देते हैं | जब वह मुड़कर देखने लगती है तो उसके गले के हार भी तोड़ देते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ के कथनानुसार समस्त ब्रजांगनाएँ सब प्रकार से हार चुकी हैं | अब कोई भी उपाय शेष नहीं है |
( प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण – बाल लीला - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

स्थिति जो है-स्वयं के सुख के लिए प्लानिंग-प्रैक्टिस करना।
स्थिति जो होनी चाहिए-हरि-गुरु के सुख के लिए प्लानिंग-प्रैक्टिस करना।

Friday, August 1, 2014

हरियाली तीज की आप सभी प्रिय मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएँ
राधे - राधे।

आज हरियाली तीज है, गोविन्द राधे !
तन मन धन तीनों हरि पै लुटा दे !!

हरियाली तीज पर हे गोविन्द राधे !
जित देखू हरी हरि ही दिखा दे !!

हरियाली तीज पर हे गोविन्द राधे!
हरि बोलू, हरि देखू , हरि ही सुना दे !!

हरियाली तीज पर हे गोविन्द राधे!
हरि मिलन की कामना उर में बढ़ा दे !!

हरियाली तीज पर हे गोविन्द राधे!
उर बिच झूला डार झूला झुला दे !!

हरि देखूँ हरि सुनूँ , गोविन्द राधे !
हरि गाऊँ हरि पाऊं , हरि ही सुंघा दे !!

हरिहूँ की हरितायी गोविन्द राधे !
हिय हर्षित करि हरिहूँ बना दे !!

आली हरियाली तीज- गोबिंद राधे !
चलो "लाली-लाल" को झूला झूला दें !!

आली हरियाली तीज-गोबिंद राधे!
चलो "लाली-लाल" हाथ मेहँदी रचा दें !!

आली हरियाली तीज- गोबिंद राधे!
चलो "लाली-लाल"को मल्हार सुना दें !!

सर्व पर्व लक्ष्य एक , गोविन्द राधे !
जग से हटा के मन, हरि में लगा दे !!

....... श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...