Friday, August 8, 2014

हरि सुत कहँ हरिदासी , जड़ माया दुख देत।
बड़ अचरज पितु लखत नित , तबहुं न सुत सुधि लेत।।८६।।

भावार्थ - मायाशक्ति , शक्तिमान भगवान् श्रीकृष्ण की दासी है। जीव , श्रीकृष्ण का पुत्र है। मायादासी जीव पुत्र को अनादिकाल से दुख दे रही है। यह दृश्य पिता सदा देखता रहता है। फिर भी पुत्र पर कृपा नहीं करता।
भक्ति शतक (दोहा - 86)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

आज नहीं कल कर लेंगे। बस ये कर लें,बस वो कर लें,फिर भजन करेंगे। इस प्रकार अनंत जन्म गँवा दिये लेकिन वह आज और कल न आ सका।
.......श्री महाराजजी।

जीव तो सदा ही अपने को अच्छा समझता है। वह भले ही पराकाष्ठा का मूर्ख क्यों न हो,उसे यह कथन बिलकुल ही प्रिय नहीं है कि तुम मूर्ख हो।
.........श्री महाराज जी।

चलो माना की हमें प्यार का इज़हार नहीं आता...........!
पर ज़ज्बात को समझ ना सको इतने तो नादान तुम भी नही.....................!!
राधे-राधे।

भक्त के लिये भगवान का प्राण समर्पित है।
GOD IS READY TO DO ANYTHING AND EVERYTHING FOR A TRULY SURRENDERED DEVOTEE.

O Lord! When will that day come ...when tears will flow continuously from my eyes as I sing Your glories?
 
सौंप दो इनके हाथों में डोरी, यह कृपालु हैं तंग दिल नहीं हैं |
Hand over the string of your life in His hands. After all, He is ‘Kripalu’ (merciful), not a miser.

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...