Friday, August 8, 2014

सच्चा गुरु कभी संसारी वस्तु नहीं दिया करता। वास्तविक गुरु कभी सिद्धियों का चमत्कार नहीं दिखाते। वे कभी मिथ्या आशीर्वाद व श्राप भी नहीं देते।
-----श्री महाराजजी।

'मोहब्बत' बुरी है........ बुरी है 'मोहब्बत'...........!
कहे जा रहे हैं... किये जा रहे हैं..........................!!
राधे-राधे।

मिट जाए गुनाहों का तसव्वुर ही इस दिल से ..........!
अगर हो यकीन कि , वो देख रहा है हमें हर पल हर घड़ी ............!!
राधे-राधे।

खरे हरि कुञ्ज लतान तरे।
Khare hari kunj lataan tare.

Shri krishna is standing in the bowery alcoves of Vrindaban.
------SHRI MAHARAJJI.

हरि सुत कहँ हरिदासी , जड़ माया दुख देत।
बड़ अचरज पितु लखत नित , तबहुं न सुत सुधि लेत।।८६।।

भावार्थ - मायाशक्ति , शक्तिमान भगवान् श्रीकृष्ण की दासी है। जीव , श्रीकृष्ण का पुत्र है। मायादासी जीव पुत्र को अनादिकाल से दुख दे रही है। यह दृश्य पिता सदा देखता रहता है। फिर भी पुत्र पर कृपा नहीं करता।
भक्ति शतक (दोहा - 86)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

आज नहीं कल कर लेंगे। बस ये कर लें,बस वो कर लें,फिर भजन करेंगे। इस प्रकार अनंत जन्म गँवा दिये लेकिन वह आज और कल न आ सका।
.......श्री महाराजजी।

जीव तो सदा ही अपने को अच्छा समझता है। वह भले ही पराकाष्ठा का मूर्ख क्यों न हो,उसे यह कथन बिलकुल ही प्रिय नहीं है कि तुम मूर्ख हो।
.........श्री महाराज जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...