Monday, August 11, 2014

दिन,महीने,सालों का हिसाब नहीं आता है मुझको.....!
हमेशा से हमेशा तक बस तेरा साथ चाहिये.......!!
राधे-राधे।

हरि-गुरु को मन में जितनी बार लाओगे उतनी ही मन की गंदगी शुद्ध होगी,और अगर गंदी बातें लाओगे तो मन और गंदा होगा।
......श्री महाराजजी।

The most important thing is, that even in adverse situations, a devotee should not feel disheartened. He must have full confidence and faith in the gracious kindness of the Divine beloved of his soul, Radha Krishna and Guru. He should use all the available time in remembrance and try to increase love and longing for them.
.........SHRI MAHARAJJI.

हम साधकों को सदा यही समझना चाहिए कि हमसे जो अच्छा काम हो रहा है, वह गुरु एवं भगवान की कृपा से ही हो रहा है क्योंकि हम तो अनादिकाल से मायाबद्ध घोर संसारी, घोर निकृष्ट, गंदे आइडियास(ideas) वाले बिलकुल गंदगी से भरे पड़े हैं। हमसे कोई अच्छा काम हो जाये, भगवान के लिए एक आँसू निकल जाय, महापुरुष के लिए, एक नाम निकल जाये मुख से, अच्छी भावना पैदा हो जाये उसके प्रति हमारी यह सब उनकी ही कृपा से हुआ ऐसा ही मानना चाहिये। अगर वे सिद्धान्त न बताते , हमको अपना प्यार न देते तो हमारी प्रवर्ति ही क्यों होती, कभी यह न सोचो की हमारा कमाल है, अन्यथा अहंकार पैदा होगा , अहंकार आया की दीनता गयी, दीनता गयी तो भक्ति का महल ढह गया। सारे दोष भर जाएंगे एक सेकंड में इसलिए कोई भी भगवत संबंधी कार्य हो जाये तो उसको यही समझना चाहिये कि गुरु कृपा है, उसी से हो रहा है ताकि अहंकार न होने पाये। अगर गुरु हमको न मिला होता, उसने हमको न समझाया होता ,उसने अपना प्यार दुलार न दिया होता, आत्मीयता न दी होती तो हम ईश्वर कि और प्रव्रत्त ही न होतें। अत: उन्ही की कृपा से सब अच्छे कार्य हो रहें है ऐसा सदा मान के चलो।
-----------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।

सखी ! पिय, अतिशय सरल सुभाय |
अति कोमल – चित कंत, संत कह, तू कठोर कह हाय !|
पिय निर्दोष रोष जनि करु सखि ! बात और ही आय |
ना जाने वा कुब्जा ने का, जादू – मंत्र चलाय |
मेरी मानि चलहु सब मथुरा, कुब्जहिं भेष बनाय |
तब ‘कृपालु’ हरि उर लगाय अरु, कुब्जा रह खिसियाय ||

भावार्थ – ( एक सखी द्वारा श्यामसुन्दर को कठोर कहने पर दूसरी सखी विरोध करती हुई कहती है - )
अरी सखी ! प्रियतम का स्वभाव तो अत्यन्त सरल है | महात्मा लोग भी कहते हैं कि श्यामसुन्दर का हृदय अत्यन्त कोमल है, फिर तू कठोर क्यों कहती है ? सखि ! श्यामसुन्दर निर्दोष हैं | उन पर क्रोध न कर, इसमें कुछ और ही रहस्य है | मेरी राय में तो उस कुब्जा ने ही मोहिनी – मंत्र पढ़ा दिया है, अतएव मेरी बात मान कर सब लोग कुब्जा का वेश बनाकर मथुरा को प्रयाण कर दो | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि आजकल प्रियतम को कुबरी स्त्री बहुत प्रिय है, अतएव वे सबको हृदय से लगा लेंगे और वास्तविक कुब्जा खिसियानी सी देखती रह जायेगी |

( प्रेम रस मदिरा विरह - माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

Sunday, August 10, 2014

मिट जाए गुनाहों का तसव्वुर ही इस दिल से ..........!
अगर हो यकीन कि , वो देख रहा है हमें हर पल हर घड़ी ............!!
राधे-राधे।

हरि-गुरु को मन में जितनी बार लाओगे उतनी ही मन की गंदगी शुद्ध होगी,और अगर गंदी बातें लाओगे तो मन और गंदा होगा।
......श्री महाराजजी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...