Tuesday, September 16, 2014

सब जीवों के अन्दर श्रीकृष्ण का निवास है !
Shri Krishna resides within each and every living being.
.....SHRI MAHARAJ JI.

हे करुणासिन्धु, दीनबंधु, मेरे बलबंधु तुम अपनी अकारण करुणा का स्वरूप प्रकट करते हुए मुझे अपना लो। मैं तो अनन्त जन्मों का पापी हूँ किन्तु तुम तो पतितपावन हो। यही सोचकर तुम्हारे द्वार पर आ गया।
-------श्री महाराज जी।

Shri Maharaj Ji's Literature - Profound & Practical....

Shri Maharaj Ji is freely pouring the Supreme Bliss of Shri Radha Krishn love in an unimaginable limit by all means. Apart from revealing the detailed devotional guidelines and the true philosophy of soul, maya, God, devotion and God realization, he has revealed devotional philosophy extensively. We must try to understand the importance of this opportunity and appreciate our luck that we are in this age to receive this Divine benefit. His Graciousness has no compare and his kindness has no limit. We can have a glimpse of it.

"क्षण क्षण हरि गुरु स्मरण में ही व्यतीत करो। पल पल मृत्यु की और बढ़ रहे हो और संसार में बेहोश हो।
-------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।"

Monday, September 15, 2014

जिन्होंने अपना समस्त जीवन जीव कल्याणार्थ समर्पित कर दिया , जो हर पल जीवों को प्रेम रस परिप्लुत करने के लिए लालायित रहते हैं ,
ऐसे प्रेमानन्द में निमग्न प्रेममूर्ति श्री कृपालु जी महाप्रभु को कोटि कोटि प्रणाम।

Speak less, speak softly and speak sweetly.
-----SHRI MAHARAJJI.

जरा सोचिए:
संसार मे सर्वत्र यही देखा जाता है, कि जिससे भी हमारा स्वार्थ हो हम उसे रिझाने के लिए अनेकानेक झूठे सच्चे स्वांग रचते रहते हैं । इस पर भी वह हमारे हित साधेगा ही यह जरुरी नही है ।और यह तो अंसभव ही है ,कि कोई अपने अहित की कीमत पर हमारा स्वार्थ साधे ।
और दूसरी तरफ जिसका अपना कोई स्वार्थ ही ना हो, जिसे देने के लिए हमारे पास कोई समान ही ना हो ,जिसे प्रसन्न करने के लिए हम कभी सच्चा प्रयास भी ना करते हो , वह व्यक्तित्व केवल हमारा हित साधने के लिए अनवरत , अथक व अकथ प्रयास करता रहे, वह भी हमे बिना बताये । हमारे न समझने पर दूसरी बार दूसरी तरह से फिर तीसरी तरह से फिर . . . . . . लगातार बिना निराश हुये हमारे मानसिक स्तर पर उतरकर कष्ट, पीडा व बदनामी को सहन करते हुए , हमारे परम चरम हित के लिए लगा रहे । विडम्बना ये कि हम उसे प्रसन्न करने का प्रयास कर उसके पावन चरणारविन्दो पर अपना सर्व-समर्पण कर अपने आप को लुटा देना तो दूर , उसके उपकारो को रियलआइज़(realize) भी ना करेँ . . . . . !!
हे र्दुदैव! हम और हमारे कृत्घनी मन को धिक्कार है ।
हे करुणामयी अम्मा! इससे पहले कि अधिक देर मे अंधेर हो जाये ,हमारी कुटिल कुचाली विपरीत बुद्धि को ठीक कर दो !
हमे सद्बुद्धि की भीख दे दो माँ ,चरण कमल बलिहार............. !!

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...