This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Tuesday, September 16, 2014
Shri Maharaj Ji's Literature - Profound & Practical....
Shri Maharaj Ji is freely pouring the Supreme Bliss of Shri Radha Krishn love in an unimaginable limit by all means. Apart from revealing the detailed devotional guidelines and the true philosophy of soul, maya, God, devotion and God realization, he has revealed devotional philosophy extensively. We must try to understand the importance of this opportunity and appreciate our luck that we are in this age to receive this Divine benefit. His Graciousness has no compare and his kindness has no limit. We can have a glimpse of it.
Shri Maharaj Ji is freely pouring the Supreme Bliss of Shri Radha Krishn love in an unimaginable limit by all means. Apart from revealing the detailed devotional guidelines and the true philosophy of soul, maya, God, devotion and God realization, he has revealed devotional philosophy extensively. We must try to understand the importance of this opportunity and appreciate our luck that we are in this age to receive this Divine benefit. His Graciousness has no compare and his kindness has no limit. We can have a glimpse of it.
Monday, September 15, 2014
जरा सोचिए:
संसार मे सर्वत्र यही देखा जाता है, कि जिससे भी हमारा स्वार्थ हो हम उसे रिझाने के लिए अनेकानेक झूठे सच्चे स्वांग रचते रहते हैं । इस पर भी वह हमारे हित साधेगा ही यह जरुरी नही है ।और यह तो अंसभव ही है ,कि कोई अपने अहित की कीमत पर हमारा स्वार्थ साधे ।
और दूसरी तरफ जिसका अपना कोई स्वार्थ ही ना हो, जिसे देने के लिए हमारे पास कोई समान ही ना हो ,जिसे प्रसन्न करने के लिए हम कभी सच्चा प्रयास भी ना करते हो , वह व्यक्तित्व केवल हमारा हित साधने के लिए अनवरत , अथक व अकथ प्रयास करता रहे, वह भी हमे बिना बताये । हमारे न समझने पर दूसरी बार दूसरी तरह से फिर तीसरी तरह से फिर . . . . . . लगातार बिना निराश हुये हमारे मानसिक स्तर पर उतरकर कष्ट, पीडा व बदनामी को सहन करते हुए , हमारे परम चरम हित के लिए लगा रहे । विडम्बना ये कि हम उसे प्रसन्न करने का प्रयास कर उसके पावन चरणारविन्दो पर अपना सर्व-समर्पण कर अपने आप को लुटा देना तो दूर , उसके उपकारो को रियलआइज़(realize) भी ना करेँ . . . . . !!
संसार मे सर्वत्र यही देखा जाता है, कि जिससे भी हमारा स्वार्थ हो हम उसे रिझाने के लिए अनेकानेक झूठे सच्चे स्वांग रचते रहते हैं । इस पर भी वह हमारे हित साधेगा ही यह जरुरी नही है ।और यह तो अंसभव ही है ,कि कोई अपने अहित की कीमत पर हमारा स्वार्थ साधे ।
और दूसरी तरफ जिसका अपना कोई स्वार्थ ही ना हो, जिसे देने के लिए हमारे पास कोई समान ही ना हो ,जिसे प्रसन्न करने के लिए हम कभी सच्चा प्रयास भी ना करते हो , वह व्यक्तित्व केवल हमारा हित साधने के लिए अनवरत , अथक व अकथ प्रयास करता रहे, वह भी हमे बिना बताये । हमारे न समझने पर दूसरी बार दूसरी तरह से फिर तीसरी तरह से फिर . . . . . . लगातार बिना निराश हुये हमारे मानसिक स्तर पर उतरकर कष्ट, पीडा व बदनामी को सहन करते हुए , हमारे परम चरम हित के लिए लगा रहे । विडम्बना ये कि हम उसे प्रसन्न करने का प्रयास कर उसके पावन चरणारविन्दो पर अपना सर्व-समर्पण कर अपने आप को लुटा देना तो दूर , उसके उपकारो को रियलआइज़(realize) भी ना करेँ . . . . . !!
हे र्दुदैव! हम और हमारे कृत्घनी मन को धिक्कार है ।
हे करुणामयी अम्मा! इससे पहले कि अधिक देर मे अंधेर हो जाये ,हमारी कुटिल कुचाली विपरीत बुद्धि को ठीक कर दो !
हमे सद्बुद्धि की भीख दे दो माँ ,चरण कमल बलिहार............. !!
हे करुणामयी अम्मा! इससे पहले कि अधिक देर मे अंधेर हो जाये ,हमारी कुटिल कुचाली विपरीत बुद्धि को ठीक कर दो !
हमे सद्बुद्धि की भीख दे दो माँ ,चरण कमल बलिहार............. !!
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मन का अटैचमेंट किसमें करें?
एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...
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Baar Baar suno, Baar Baar suno, tab tatvagyan paripakva hoga. Ye jo hum Logo ko Brham hota hai ki yeh to maine bahut suna hai, yeh to mein j...
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गुरु में हरिबुद्धि रखो सदा गुरुधामा | नरबुद्धि आने नहिं पाये आठु यामा || गुरु के प्रति सदैव भगवद् बुद्धि ही रखो | निरन्तर यह सावधानी र...
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






