Friday, February 20, 2015

It is your mind alone Which your greatest enemy.
मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है !
........SHRI MAHARAJ JI.

84 लाख शरीरों में मानव देह ही ऐसा है जिसमें साधना द्वारा मानव , महामानव बन सकता है।
किन्तु साथ ही यह मानव देह क्षणभंगुर है। अतएव तन,मन,धन,का उपयोग भगवद्विषय में तुरन्त करना चाहिए।
उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ( वेद )
उठो , जागो , महापुरुष की शरण में जाओ एवं अपना लक्ष्य प्राप्त करो।
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सत्संग हो या कुसंग, मनुष्य जैसा संग करता है वैसा ही बन जाता है।
.........श्री महाराजजी।

I am Yours Forever........!!!
"When I am yours,then why do you
ever feel discouraged?
He,Shri Krishna loves fallen souls,
so why worry?"
 

Sunday, September 28, 2014

साधक को किसी से द्वेष भाव नहीं रखना चाहिये ! यदि हो जाये तो बार - बार उसका चिंतन न करे ! यदि है भी तो कथन में उसके सामने प्रकट न करे ! संसार में सब स्वार्थी हैं अतः इस विषय को लेकर किसी से द्वेष होना गलत है।
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

सदा यह चिन्तन बनाये रखो कि मुझे उनका जितना स्नेह , अनुग्रह मिल चुका है वही अनन्त जन्मों के पुण्यों से असम्भव है। अतएव पूर्ण प्राप्त स्नेह एवं अनुग्रह का चिन्तन करके बार - बार बलिहार जाओ।
~~~~~~जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाप्रभु~~~~~~~

किसी को कभी किसी जन्म में श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ महापुरुष गुरु मिल जाये और वह श्रद्धालु विरक्त जिज्ञासु उसे गुरु मान ले यह बहुत बड़ी भगवदकृपा है। गुरु शिष्य नहीं बनायेगा,शिष्य को मन से गुरु मानना होगा। कोई महापुरुष किसी जीव को शिष्य तब तक न बनायेगा जब तक उसका अंत:करण पूर्णतया शुद्ध न हो जायेगा।
-------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...