Thursday, February 26, 2015

A devotee should always, every moment, remember his soul relationship with Radha Krishn and feel affinity. The more you will remember, the closer you will feel with Them. This remembrance is like the life force of all other aspects of devotion, so it is of first importance.
--------SHRI MAHARAJJI.

हरि-गुरु सदैव हमारी रक्षा करते रहे हैं, वर्तमान में भी कर रहे हैं। हम नहीं जानते हम किस खतरे में पड़ जाते अब तक?
-----श्री महाराजजी।

Friday, February 20, 2015

धरो मन गौर चरण को ध्यान ।
जिन चरनन को अपने हिये में धारत सुन्दर श्याम ।।
राधे-राधे।
It is your mind alone Which your greatest enemy.
मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है !
........SHRI MAHARAJ JI.

84 लाख शरीरों में मानव देह ही ऐसा है जिसमें साधना द्वारा मानव , महामानव बन सकता है।
किन्तु साथ ही यह मानव देह क्षणभंगुर है। अतएव तन,मन,धन,का उपयोग भगवद्विषय में तुरन्त करना चाहिए।
उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ( वेद )
उठो , जागो , महापुरुष की शरण में जाओ एवं अपना लक्ष्य प्राप्त करो।
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
सत्संग हो या कुसंग, मनुष्य जैसा संग करता है वैसा ही बन जाता है।
.........श्री महाराजजी।

I am Yours Forever........!!!
"When I am yours,then why do you
ever feel discouraged?
He,Shri Krishna loves fallen souls,
so why worry?"
 

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...