Sunday, March 8, 2015

Although human body is invaluable, it is transient. Therefore to procrastinate in devotional practise even for a moment is the greatest loss.
मानव देह अमूल्य होते हुये भी क्षणिक है अतः परमार्थ साधना में एक क्षण का भी उधार सबसे बडी हानी है।
........श्री महाराज जी।
कोशिश करने पर अवश्य ही दोष कम होते हैं। लेकिन जब कोशिश ही कम होती है तब दोष भी कम ठीक होते हैं। गलती तो सभी से होती है , लेकिन बार - बार कहने पर भी गलती हो , यह सबसे बड़ी मिस्टेक(mistake) है।
लोगों को दूसरों की तो बड़ी भारी फिक्र है लेकिन हमारा क्या होगा , इसकी फिक्र क्यों नहीं करते हो।
………जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

Thursday, March 5, 2015

होली क्यों मनायी जाती है ?
होली और भक्ति पर्यायवाची ही मानना चाहिये । होली का पर्व निष्काम प्रेम का पर्व है । भक्ति की विजय का पर्व है । भक्त शिरोमणि प्रह्लाद की भक्ति से प्रसन्न हो कर भगवान ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु राक्षस का संहार किया जो केवल राक्षस ही नहीं था इतना बड़ा तपस्वी था कि उसके तप से स्वर्गलोक भी जलने लगा था किन्तु इतना बड़ा तपस्वी भी भक्ति से हार मन गया । अतः प्रह्लाद चरित्र यह सिद्ध कि समस्त ज्ञान-योग आदि से भी अन्नत गुना उच्च स्थान है भक्ति का । इसी खुशी में यह उत्सव मनाया जाता है । लेकिन उत्सव मनाने का ढंग लोगों ने अनेक प्रकार अपना लिया है ।
------- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
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और द्वार जाओ न अनन्य बनो बामा।
त्रिगुण , त्रिताप , त्रिकर्म , काटें श्यामा।


Exclusively surrender to Shri Shyama. Do not go any where else . Through Her grace , you will be freed from the bondage of trigun, tritap and trikarm.
Shyama Shyam Geet - 47
-Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj.
Radha Govind Samiti.
The Real Significance of Holi by Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj......!!!

अधिकतर लोग यही समझते है की रंग,गुलाल से खेलना,हुडदंग बाजी करना,तरह तरह के स्वादिष्ट व्यंजन खाना यही होली मानाने का तात्पर्य है। वास्तव में होली का पावन पर्व श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति का पर्व है। होली मनाने का अभिप्राय ही है की प्रह्लाद चरित्र को समझते हुये उनके भक्ति संबंधी सिद्धांतो का अनुसरण करना।
अतः होली मनाने का सर्वश्रेष्ठ ढंग यही है की रूपध्यान युक्त श्री राधा कृष्ण नाम,रूप, लीला,गुण,धाम,जन का गुणगान करुणक्रन्दन करते हुये किया जाये।
भक्त प्रह्लाद की परम निष्काम भक्ति एवं उनके दृढ़ विश्वास के कारण भगवान ने खम्भे से प्रकट होकर यह सिद्ध कर दिया ही मैं सदा सर्वत्र सामान रूप में व्याप्त हूँ। अतः हमे हरि-गुरु को सदा अपने रक्षक और निरीक्षक रूप में अनुभव करते हुये ये चिंतन करना है की सदा हमारी रक्षा करते है और करेंगे। वे ही हमारे परम हितेषी है।
यदि कहू वर मांगो गोविन्द राधे।
वर मांगू मांगने की कामना मिटा दे।।

यह पर्व निष्काम प्रेम का सन्देश प्रसारित करते हुये महाराजजी भक्तशिरोमणि प्रह्लाद चरित्र का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते है। मोक्ष पर्यन्त की कामनाओ का परित्याग करके युगल प्रेम कामना ही शेष रह जाये।
यह होली पर्व के महत्व को प्रतिपादित करता है। प्रह्लाद ने असुर बालको को यही उपदेश दिया -तन का कोई भरोसा नहीं है कब यमदूत आ जाये। अतः युवावस्था को भी न परखते हुये शीध्रातिशीध्र हरि को अपना बना लो। बार बार सोचो की वे ही मेरे सर्वस्व है, उन्ही के साथ मेरे सारे सम्बन्ध है।
जय-जय श्री राधे।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु की जय हो

Wednesday, March 4, 2015

संसार के कार्य करते हुए भी बीच-बीच में बारंबार 'भगवान मेरे सामने हैं' इस प्रकार रूपध्यान द्वारा निश्चय करते रहना चाहिये। इससे दो लाभ हैं - एक तो रूपध्यान परिपक्व होगा, दूसरे हम, भगवान को अपने समक्ष, साक्षात रूप से महसूस करते हुए उच्छृंक्ल न हो सकेंगे, जिसके परिणाम स्वरूप अपराधों से बचे रहेंगे। जीव तो, किंचित भी स्वतंत्र हुआ कि बस, वह धारा-प्रवाह रूप से संसार की ही ओर भागने लगेगा।
------जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज।
श्री महाराजजी से प्रश्न:
संसार में और भगवत क्षेत्र में हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?

श्री महाराजजी द्वारा उत्तर:
भगवान से प्यार न करने के कारण आत्मशक्ति गिर गयी है इसलिए हृदय कठोर नहीं रह सकता संसार में,पिघल जाता है। यह दोष है। तो जितना भगवान की और पिघले उतना इधर कठोर हो। ऐसा balance होना चाहिए। संसार अलग है भगवान अलग है। दोनों में अलग-अलग हिसाब किताब है। चालाकी होनी चाहिए; संसार में कोई सिर काट के चरणों में रख दे तो भी यह न समझो कि यह हमारे सुख के लिए ऐसा कर रहा है। संसार में अपने स्वार्थ के लिए ही सब लोग काम करते हैं,यह सिद्धान्त को सदा याद रखो और जब भगवान के area में जा रहे हो तो वहाँ complete surrender करो। वहाँ बुद्धि लगाया कि बरबाद हुए। बड़े बड़े सरस्वती व्रहस्पति का सर्वनाश हो गया,साधारण जीव कि क्या गिनती है? तो दोनों एरिया अलग अलग हैं,अलग अलग सिद्धान्त है,अलग अलग प्रक्रियाएँ हैं।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...