Friday, March 13, 2015

श्री राधे हमारी सरकार, फ़िकिर मोहिं काहे की ।
हित अधम उधारन देह धरेँ, बिनु कारन दीनन नेह करेँ ;
जब ऐसी दया दरबार , फ़िकिर मोहिं काहे की ।
...........श्री महाराज जी।
If you want to make God laugh, tell him your future plans.

Wednesday, March 11, 2015

गहो रे मन! शयाम चरण शरणाई।
Gaho re man ! Shyam charan sharnaaee.


O my mind! Take shelter at the lotus feet of Shyam Sundar.

......SHRI MAHARAJ JI.

जब दीनता आयेगी तब आँसुओं के ढेर लगेंगे। प्रत्येक व्यक्ति तुमको अपने से ऊँची स्टेज का साधक लगेगा।
!! जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज !!
संत संग सत्संग करू , तिन सेवहु दिन रात।
श्रद्धा , रति , अरु भक्ति सब , आपुहिं तेहि मिली जात।।५०।।

भावार्थ - किसी वास्तविक रसिक की शरण ग्रहणकर , उनका सतत सत्संग करते रहने से श्रद्धा , रति एवं भक्ति क्रमशः स्वयं प्राप्त हो जाती है।
भक्ति शतक (दोहा - 50)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

बिनु हरि कृपा न पाई सक , ज्ञानिहुँ ब्रहम ज्ञान।
ब्रहम अकर्ता वेद कह , सोचहु मनहिँ सुजान।।४९।।

भावार्थ - बिना सगुण साकार भगवान् की कृपा के ज्ञानी को भी ब्रहमज्ञान नहीं हो सकता। क्योंकि ज्ञानियों का ब्रहम कुछ नहीं करता। फिर कृपा करने का तो प्रश्न ही नहीं है।
भक्ति शतक (दोहा - 49)
---जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

Tuesday, March 10, 2015

हाय दई, यह कैसी भई री |
केहि विधि कासों कहूँ आपनी, जार प्रेम की बात नई री |
देखन को छोटा अति खोटा, नँद – ढोटाहिं ठगाय गई री |
भई लटू मैं भटू पटू ह्वै, नेकु हँसनि मन बेच दई री |
पलक शब्द विपरीत भयो अब, विष – बेलरि उर माहिं बई री |
सिगरो जन सूनो सो दीखत, विरह घटा नैनन उनई री |
यह ‘कृपालु’ पिय – प्रेम विषामृत, परम चतुर दै शीश लई री ||

भावार्थ – एक विरहिणी सखी से कहती है कि हाय ! यह तो बड़ा ही बुरा हुआ | अब इस परपुरुष – रूप श्यामसुन्दर के प्रेम की बात को किस प्रकार किसी से कहूँ | देखने में तो वह नन्द का लाल छोटा ही है, किन्तु वह इतना खोटा है कि मुझ अत्यन्त चतुर को भी ठग लिया | अरी सखी ! मैं चतुर होते हुए भी थोड़ी – सी मुस्कान के ऊपर अपने मन को बेचकर उस पर दीवानी हो गयी | अब हमारे लिए एक – एक पल कल्प के समान हो गया है ( पलक शब्द का उल्टा कलप ) एवं हृदय में विरह की विष – बेल फैल गई है | मुझे सारा संसार शून्य – सा प्रतीत होता है, एवं विरह के बादल आँखों से आँसू बरसा रहे हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि अरी सखी ! यह विष एवं अमृत मिला हुआ प्रेम जो तुझे मिला है वह बड़े – बड़े ज्ञानियों के लिए भी दुर्लभ है | इसको पाने कि लिए तो अत्यन्त ही चतुर अपना शीश प्रदान करते हैं |
( प्रेम रस मदिरा विरह – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...