Friday, March 13, 2015

वास्तविक महापुरुष के सान्निध्य में संसार से सहज वैराग्य एवं भगवान में सहज अनुराग बढ्ने लगता है। तत्वज्ञान परिपक्व होने लगता है। जीव अवश्य महसूस करने लगता है कि वो कल्पना भी नहीं कर सकता था की भगवदविषय में कभी इतना मन लगने लगेगा, इतना समय वो दे पाएगा।

जैसे कोई अन्धा किसी दूसरे अन्धे से कहे तू नेत्रवान है मुझे घर पहुँचा दे , उसी प्रकार संसार में किसी भी प्राणी के पास सुख नहीं है किन्तु परस्पर सभी एक दुसरे से सुख की आशा लगाये हैं।
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

"Dear Devotees,
Practice, Practice and Practice!
Withdraw your mind from the world and engage it in God. Make it your spiritual practice to do so again and again . . ."
........SHRI MAHARAJ JI.
यह समझे रहना है की हमारे प्रेमास्पद श्री कृष्ण सर्वत्र है एवं सर्वदा है।विश्व में एक परमाणु भी ऐसा नहीं है, जहाँ उसका निवास न हो।जैसे तिल में तेल व्याप्त होता है ऐसे ही भगवान भी सर्वव्यापक है।उनको कोई भी स्थान या काल अपवित्र नहीं कर सकता।वरन वे ही अपवित्र को पवित्र कर देते है।
-----------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
यदि तन , मन , धन हरि गुरु को समर्पित नहीं किया गया तो संसार अवश्य ही इन्हें लूट लेगा ।
----श्री महाराज जी।
हरि-गुरु में अनन्त सामर्थ्य है, पर हमारा साथ छोड़ने की उनमे सामर्थ्य ही नहीं है। इस विषय में वे बेचारे लाचार हैं।
.....श्री महाराजजी।
ये मन दुश्मन हैं, इससे सदा सावधान रहो। मन को सदा हरि गुरु के चिंतन में लगाये रहो तो मन शुद्ध होगा। भगवान् कहते हैं सदा सर्वत्र मेरा स्मरण करते रहो ताकि मरते समय मेरा स्मरण हो और तुम्हें मेरा लोक मिले , मेरी सेवा मिले।
*******जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु********

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...