Friday, May 1, 2015

ठाकुर युगल किशोर हमारों........चाकर हम पिय प्यारी के।
गुरु सेवा ही धर्म हमारों................दास न हम श्रुतिचारी के।।

.....श्री महाराज जी।

Thursday, April 23, 2015

"सौंप दो इनके हाथों में डोरी, यह कृपालु हैं तंग दिल नहीं हैं |
Hand over the string of your life in His hands. After all, He is ‘Kripalu’ (merciful), not a miser."
In our countless lives we must have been hankering for the attainment of God and must have selected many Gurus. Either the Guru was not genuine or we were not deserving. Maybe we did not perform devotional practice in the right manner as told by him. One of us was definitely wrong otherwise we would have attained our goal. Eligibility is necessary in the world. If you want to study a Bachelor of Law degree, you should be a graduate first. Similarly, if you desire anything in the world you must be eligible for it.
......SHRI MAHARAJJI.
आज्ञा सम न सुसाहिब सेवा।
सेवा का अभिप्राय है अपने स्वामी को सुख देने का लक्ष्य रखकर स्वामी की आज्ञानुसार सेवा करना। उनकी आज्ञापालन ही सेवा है,अपनी इच्छानुसार 'सेवा' सेवा नहीं।

भगवान् के नाम , रूप , लीला , गुण , धाम की अभिन्नता का सिद्धान्त जन जन के मस्तिष्क में भरकर विभिन्न संकीर्तन पद्धतियों द्वारा ब्रजरस प्रवाहित करने वाले ब्रजरस रसिक गुरुवर को कोटि कोटि प्रणाम।
"तू प्रेम रूप रस सार। तेरा अंधाधुंध दरबार।।
तू तो करुणा की अवतार। तू है कृपा रूप साकार।।"
संसारी दोष कितने कम हुए, हमे इस पर हर समय दृष्टि रखनी है । हमारे स्वभाव मेँ अहमता, ममता कितनी कम हुई ,इस और ध्यान देना है । स्वाभिमान कितना कम हुआ,अपने अपमान का अनुभव होना कितना कम हुआ,आत्म-प्रशंसा कितनी अचछी लगती है । संसारी विषयों के अभाव मेँ कितना दुख होता है,उनके मिलने मेँ कितना सुख मिलता है, यह सब अपनी आध्यात्मिक उन्नति को नापने का सबसे बढ़िया पैमाना है।
------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...